अमेरिका और भारत एक बार फिर बातचीत की मेज पर हैं, व्यापारिक विवादों के जटिल जाल को सुलझाने के प्रयास में जुटे हुए है। शुल्कों की समयसीमा नजदीक आ रही है और दोनों पक्ष अपने उद्योगों की सुरक्षा करते हुए आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के लिए किसी समझौते के प्रयास में लगे हुए हैं। लेकिन क्या वे आम सहमति तक पहुंच पाएंगे या यह फिर से बिना नतीजे के एक और दौर साबित होगा?
मुद्दे के केंद्र में प्रमुख निर्यात उत्पादों पर लगाए गए शुल्क हैं। वहीं भारत स्टील, एल्युमिनियम और आईटी उत्पादों पर राहत चाहता है, जबकि अमेरिका भारत के कृषि और चिकित्सा उपकरण बाजारों तक अधिक पहुंच बनाने की मांग कर रहा है। दांव बहुत ऊंचे हैं। यदि समझौता सफल होता है, तो व्यापार में वृद्धि होगी और अधिक निवेश आकर्षित होगा, लेकिन असफलता की स्थिति में जवाबी शुल्क और कूटनीतिक संबंधों में खटास आ सकती है। भारत के लिए लक्ष्य ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बनाए रखना है, साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में विदेशी प्रतिस्पर्धा को सीमित करना है। वहीं, अमेरिका के लिए प्राथमिकता अमेरिकी कंपनियों के लिए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना है। नेताओं के पास एक संतुलित समझौता करने के लिए सीमित समय है।
क्या यह ऐतिहासिक सफलता होगी या अमेरिका-भारत व्यापार तनाव की एक और कड़ी? इतना तय है कि इस वार्ता का परिणाम आने वाले वर्षों तक इन दोनों वैश्विक शक्तियों के आर्थिक संबंधों को प्रभावित करेगा।




