हाल के दिनों में हवाई उड़ान को लेकर तमाम ऐसी खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं कि जिससे आम लोगों के मन में हवाई यात्रा को लेकर असुरक्षा बोध पनपा है। यह स्वाभाविक है क्योंकि हवाई यात्रा के साथ तमाम तरह के जोखिम जुड़े हैं।
हाल ही में हुए एक राष्ट्रव्यापी ऑनलाइन सर्वेक्षण में लगभग 76 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि भारत में कई एयरलाइनें यात्रियों की सुरक्षा की तुलना में प्रचार पर ज़्यादा धन खर्च कर रही हैं। नि:संदेह यह गलत प्राथमिकताओं का एक ज्वलंत प्रसंग है, जो यही दर्शाता है कि हवाई यातायात व्यवस्था को पारदर्शी व जवाबदेह बनाने की सख्त जरूरत है। यह भी कि यात्रियों की सुरक्षा और कुशल हवाई संचालन में किसी चूक के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति सख्ती से अपनाई जानी चाहिए। नि:संदेह इस बाबत सख्त कार्रवाई कुशल व सुरक्षित हवाई यातायात का मार्ग सुनिश्चित करेगी। विडंबना यह है कि हमने विगत के हवाई हादसों से कोई गंभीर सबक नहीं सीखे। ‘सब चलता है’ की नीतियां ही क्रियान्वित होती रही हैं। एक के बाद एक हादसों के लिए जांच आयोग तो कई बैठे, लेकिन सुधार के प्रयास तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचे। हमारी राजनीतिक अक्षमताएं और निगरानी करने वाले संस्थानों में राजनीतिक हस्तक्षेप से अनुभवहीन लोगों को बैठाना भी हवाई परिचालन में अव्यवस्था का सबब बना। जिसके चलते हमारी हवाई व्यवस्था असुरक्षा के भय से मुक्त न हो पा रही है। साथ ही हमारी हवाई सेवाएं वैश्विक मानकों की कसौटी पर खरी न उतर पायीं। जिसका खमियाजा देश के हवाई यात्री भी भुगत रहे हैं।
नि:संदेह विश्व की चौथी आर्थिक शक्ति बने भारत में नागरिक सेवाओं में यह गुणवत्तापूर्ण झलक नजर आनी चाहिए। यह गुणवत्ता विदेशी निवेशकों के लिए भी जरूरी है, लेकिन फिलहाल हमारा नागरिक सेवाओं के प्रति अपेक्षित भरोसा नहीं बन पा रहा है। उल्लेखनीय है कि नागरिक सहभागिता मंच, लोकल सर्किल्स द्वारा किए गए सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि सर्वे में शामिल 64 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि पिछले तीन वर्षों में कम से कम एक बार उन्होंने कठिन उड़ान का अनुभव किया था, जिसमें टेकऑफ़, लैंडिंग या उड़ान के दौरान कठिन परिस्थितियां शामिल थीं।

