देश में पश्चिम एशिया संकट के बीच इस महीने चौथी बार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां ईंधन की कीमतें अपेक्षाकृत कम बनी हुई हैं। वहीं कांग्रेस और INDIA गठबंधन शासित राज्यों में पेट्रोल-डीजल पर सबसे अधिक वैट लगाया जा रहा है, जिसके कारण आम जनता को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत लगभग ₹.102 प्रति लीटर दर्ज की गई है, जबकि गुजरात में पेट्रोल ₹.101 प्रति लीटर बिक रहा है। दूसरी ओर तेलंगाना में पेट्रोल की कीमत ₹. 118 प्रति लीटर के पार पहुंच गई है। केरल में पेट्रोल ₹. 114.9 प्रति लीटर और कर्नाटक में ₹. 110.3 प्रति लीटर के स्तर पर पहुंच चुका है।
आंकड़ों के अनुसार कांग्रेस शासित राज्य अपने नागरिकों से पेट्रोल पर लगभग ₹.16 प्रति लीटर अतिरिक्त टैक्स वसूल रहे हैं। कांग्रेस लगातार केंद्र सरकार पर ईंधन कीमतों को लेकर सवाल उठाती रही है, लेकिन उसके अपने राज्यों में वैट दरें देश में सबसे अधिक बनी हुई हैं। इस महीने केवल चार दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग ₹. 7.5 प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत में यह वृद्धि अभी भी सीमित दायरे में है, खासकर उन देशों की तुलना में जहां सरकारें सीधे ईंधन पर भारी सब्सिडी देती हैं।
आंध्र प्रदेश में पेट्रोल पर लगभग 31 प्रतिशत वैट के साथ प्रति लीटर ₹.4 अतिरिक्त शुल्क और सड़क विकास उपकर लगाया जाता है। इससे कुल प्रभावी टैक्स दर लगभग 35 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। वहीं केरल सरकार आधार वैट के अलावा सामाजिक सुरक्षा उपकर भी वसूलती है। देश के छह राज्यों में पेट्रोल की कीमत ₹.102 प्रति लीटर या उससे कम बनी हुई है। इनमें गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, गोवा और असम शामिल हैं। इन सभी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं।
सूत्रों के अनुसार विपक्षी दल लगातार केंद्र सरकार से उत्पाद शुल्क घटाने की मांग करते हैं, लेकिन उन्होंने अपने राज्यों में वैट कम करने की दिशा में कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है। मार्च में केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर ₹.10 प्रति लीटर उत्पाद शुल्क घटाया गया था, जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों ने इसका पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाया। राज्य स्तर के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि पेट्रोल और डीजल पर सबसे अधिक टैक्स केंद्र सरकार नहीं बल्कि कई राज्य सरकारें वसूल रही हैं। विशेष रूप से दक्षिण भारत के कई राज्यों में ईंधन पर भारी टैक्स बोझ के कारण आम जनता पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।

