आज जिस तरह से औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियां बढ़ी हैं। अर्थव्यवस्था के मामले में भारत लगातार ऊपर के पायदान पर चढ़ता नजर आ रहा है। उसमें सडक़ों का ढांचा मजबूत किए बिना आगे बढ़ पाना संभव नहीं है। अगस्त के महीने में जगह-जगह हो रही बारिश से सडक़ें पूरी तरह से जर्जर हो रही है। कहीं-कहीं तो जमीन या तो गढ्डों में तब्दील हो गई है या फिर धंस गई है। राजस्थान में भारी बारिश का दौर अभी जारी है। जिसके चलते बूंदी के हिंडौली में बाढ़ जैसे हालात बने हुए है। सडक़ों की दयनीय हालत से आमजन का निकलना दूभर हो रहा है। आर्थिक विकास के लिए सुदृढ़ सडक़ें भी आवश्यक हैं। इसलिए हर गांव, हर शहर को द्रुतगामी मार्गों से जोडऩे पर बल दिया जाता है। निस्संदेह पिछले कुछ वर्षों में सडक़ों के विस्तार उनकी बेहतरी और पहुंच बढ़ाने की दिशा में काफी काम हुआ है। वैसे इसी कड़ी में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आठ नई परियोजनाओं को भी मंजूरी दी है। विभिन्न राज्यों को जोडऩे वाले राजमार्गों के बीच पडऩे वाले शहरी अवरोधों को दूर कर द्रुतगामी बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। निश्चय ही इन सडक़ों के बनने से लंबी दूरी की यात्रा करने वालों और माल ढुलाई में काफी सुविधा होगी। वे शहरों के बीच भीड़ में फंस कर बेवजह समय और पैसा बर्बाद करने से बच सकेंगे। औद्योगिक इकाईयों को कच्चा माल लाने और अपने उत्पाद दूसरी जगह भेजने में बहुत आसानी होगी। फिर सडक़ें बेहतर होंगी तो औद्योगिक क्षेत्रों का विस्तार होगा और निवेश बढऩे की उम्मीद भी जागेगी। सडक़ों के निर्माण का विरोध नहीं किया जा सकता। मगर उनसे दूसरी बुनियादी सुविधाओं का नुकसान नहीं होना चाहिए। विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरण आदि विभागों से मंजूरी लेने की शर्ते लचीली कर दी गई है। इस कारण बेवजह तोड़-फोड़ और प्रकृति संरक्षण की प्रतिबद्धता धूमिल हुई है। कई शहरों में सडक़ों के विस्तार के लिए बहुत सारे लोगों के बसे-बसाए घर जमींदोज कर दिए गए। उन्हें अवैध करार दे दिया गया। फिर सडक़ों, पुलों आदि के निर्माण में जरूरी मानकों की भी परवाह अक्सर नहीं देखी जाती, जिसका नतीजा है कि निर्माण के दौरान ही या कुछ दिनों बाद उनके धंसने-टूटने की शिकायतें आनी शुरू हो जाती हैं। विकास परियोजनाओं में भ्रष्टाचार पर लगाम कसना तो एक बड़ा मुद्दा है।

