भारतीय अर्थव्यवस्था वैसे तो बहुत मजबूत है, पर देश में आज भी कुशल श्रमिकों की भारी कमी है। इसके चलते ही बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है। उद्योग जगत को अभी भी कुशल श्रमिकों की तलाश है। वैसे तो विदेशों में भी कुशल श्रमिकों और प्रबंधन में प्रोफेशनल्स की काफी मांग है। कई देश आज भी पेशेवरों की मांग कर रहे हैं। प्रतिभा की कमी अथवा अकुशलता उद्योग जगत में एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। ऐसा लगता है कि कुशल श्रमिकों की कमी ने भारत की इंजीनियरिंग और पूंजीगत समान कंपनियों को सर्वाधिक प्रभावित किया है। उद्योग के अधिकारियों ने इस कमी के लिए भारत की बढ़ती ऑर्डरबुक की बढ़ती मांग को जिम्मेदार बताया है, जबकि अन्य कारक भी आपूर्ति को प्रभावित कर रहे हैं। कुशल कारीगरों की कमी के कई कारण हैं। उनमें से एक कारण यह भी है कि सभी श्रमिक कुशल नहीं हैं और जिन्हें हम कुशल बनाते हैं वे बेहतर वेतन के लिए पश्चिम एशियाई देशों का रुख कर लेते हैं। इंजीनियरिंग कंपनियों के लिए वातानुकूलित वातावरण को प्राथमिकता देना श्रम आपूर्ति को प्रभावित करने वाला एक और बड़ा कारण है। उद्योग के कई लोगों का कहना है कि कमी के एक बड़े हिस्से के लिए कौशल अंतर को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। मुख्य क्षेत्रों से लेकर सेवाओं तक समस्या व्यापक है और यह इंजीनियरों से लेकर दिहाड़ी मजदूरों तक नियुक्तियों के विभिन्न स्तरों तक मौजूद है। विनिर्माण क्षेत्र में 10 से 20 फीसदी कार्यबल की कमी है जिससे मशीन ऑपरेटर, वेल्डर, फिटर, ड्राइवर, तकनीशियन, बढ़ई, प्लंबर जैसी अन्य भूमिकाएं प्रभावित हो रही हैं। वास्तव में हमारे शिक्षित और कम पढ़े-लिखे युवाओं में कौशल की कमी है। बढ़ती आर्थिक गतिविधि और बुनियादी ढांचे के विकास से प्रेरित प्रतिभा की बढ़ती मांग के बावजूद, यह क्षेत्र महत्वपूर्ण चुनौतियों से जूझ रहा है। इनमें उम्रदराज कार्यबल और नए परिवेशकों की घटती आमद शामिल है। यदि भारत नई तकनीकों या निर्माण उद्योग में निवेश करने जैसी जरूरतों पर ध्यान नहीं देता तो उसे काफी नुकसान हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि भारत के युवाओं में कौशल विकसित किया जाए।

