पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में डेसा जंगल में आतंकवादियों के हमले में सेना के कैप्टन समेत 5 जवानों की शहादत पर हम सभी भारतवासी सोचने को मजबूर है। यह सभी भारतवासियों के लिए चिंता का विषय भी है। आखिर कब तक हमारे जवान शहीद होते रहेंगे? एक सवाल यह भी उठता है कि आखिर कब तक हमारे जवान अपनी शहादत देते रहेंगे। पहले कहा जाता था कि जम्मू-कश्मीर में पाक समर्थित आतंकवाद घाटी तक सीमित है। पिछले 20 वर्षों में जम्मू संभाग से आतंकवाद का सफाया कर दिया गया था। सुरक्षा बलों का दावा था कि आतंकवाद अब घाटी के दो-तीन जिलों में ही सिमट कर रह गया है लेकिन जिस तरह से हाल ही में जम्मू, कठुआ, डोडा, राजौरी, पुंछ में हमले हुए हैं और सेना के काफिलों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है उससे साफ है कि जम्मू संभाग में आतंकवाद फिर से लौट आया है। हाल ही में हुए हमलों में आतंकवादियों ने अमेरिका की अत्याधुनिक राइफलें इस्तेमाल की हैं, जो पाकिस्तान को अमेरिका ने ही दी थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में फिर से खूनी खेल खेलने के लिए आतंकवादियों की मदद कर रहा है। आतंकवादी हमलों में स्लीपर सैल भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। स्लीपर सैल में वे स्थानीय लोग शामिल किए जाते हैं जो आतंकवादियों की मदद करते हैं और बाद में आम जनता में घुलमिल जाते हैं, इसलिए इन्हें पहचानना बहुत मुश्किल हो जाता है। आतंकवादियों ने अमरनाथ यात्रियों पर हमले की साजिश कई बार रची। पिछले दिनों कटरा के शिव खोड़ी मंदिर से माता वैष्णो देवी मंदिर तक तीर्थयात्रियों को लेकर जा रही बस पर आतंकियों की फायरिंग के बाद दुर्घटना दुखद भी है और चिंताजनक भी है। जम्मू-कश्मीर का माहौल सुधरने के बाद वहां के बाजार, पर्यटक स्थल गुलजार हुए हैं और राज्य की अर्थव्यवस्था सुधर रही है। इसलिए देशद्रोही नहीं चाहते कि कश्मीर में शांति आए और वहां पर निर्वाचित सरकार काम करे। इसमें कोई संदेह नहीं कि सुरक्षा बल आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देगा लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा बलों को आतंकियों के प्रति अपनी रणनीति बदलनी होगी और आतंकी जिन बिलों में छिपे होंगे उन्हें वहां से निकालकर ढेर करना होगा।

