भारत में सामाजिक समानता और समावेशी विकास के महत्व को दर्शाने वाला अंत्योदय दिवस आज मनाया जाएगा। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य देश के हर नागरिक तक विकास की किरण पहुंचाना है। यह दिन भारतीय जनसंघ के प्रमुख विचारक और महान समाजसेवी पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। उनका दृढ़ विश्वास था कि देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति का पैमाना यह होना चाहिए कि समाज का सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति कितना सशक्त हुआ है। जब तक पंक्ति में खड़े आखिरी व्यक्ति का विकास नहीं होता, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता और विकास की परिकल्पना अधूरी है। अंत्योदय का अर्थ ही समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति का उदय और विकास है। भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में लंबे समय तक गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियां मौजूद रही हैं। ऐसे में अंत्योदय की सोच ने विकास को केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित न रखकर सामाजिक कल्याण से जोडऩे का कार्य किया। भारत सरकार ने वर्ष, 2014 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती 25 सितंबर को अंत्योदय दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। अंत्योदय की अवधारणा की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि विकास की प्रक्रिया में कई बार समाज के कमजोर वर्ग पीछे रह जाते हैं। आर्थिक प्रगति के साथ यह जरूरी है कि उसका लाभ ग्रामीण क्षेत्रों, गरीब परिवारों, श्रमिकों, किसानों और जरूरतमंद लोगों तक भी पहुंचे। अंत्योदय दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश भी है। हमें यह प्रेरित करता है कि विकास की योजनाओं का केंद्र आम नागरिक होना चाहिए। जब समाज का अंतिम व्यक्तिभी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन के अवसर प्राप्त करेगा, तभी राष्ट्र की प्रगति सही मायनों में पूर्ण मानी जाएगी। आज के समय में अंत्योदय की भावना पहले से अधिक प्रासंगिक है। तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास के दौर में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि कोई भी वर्ग विकास की मुख्यधारा से बाहर ना रह जाए।

