अल नीनो और अमेरिका-ईरान तनाव जैसे बाहरी झटके भारत की अर्थव्यवस्था को इन दिनों काफी प्रभावित कर रहे हैं। मानसून की अनियमितता से कृषि उत्पादकता घटने के आसार हैं। इससे खाद्य महंगाई बढऩे की पूरी उम्मीद है। वहीं संघर्ष के चलते लगातार क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ रही है तथा आपूर्ति बाधित हो रही है। ऐसे में भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश में ईंधन, परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिससे महंगाई पर दबाव और बढ़ जाएगा। ऐसे समय में भारत को केवल महंगाई रोकने पर नहीं, बल्कि विकास और मूल्य स्थिरता दोनों पर एक साथ ध्यान देना होगा। अल नीनो के दौरान फसलों को काफी नुकसान होता है, ऐसे में सरकार को बफर स्टॉक से समय पर गेहूं और चावल की आपूर्ति बढ़ानी चाहिए। दाल, प्याज, टमाटर जैसी आवश्यक वस्तुओं का समय पर आयात करना चाहिए। जमाखोरी और कालाबाजारी पर सख्ती करनी चाहिए। किसानों को सूखा-रोधी बीज, माइक्रो-इरिगेशन और फसल बीमा का अधिक लाभ देना चाहिए। कोल्ड स्टोरेज और कृषि लॉजिस्टिक्स को मजबूत करना चाहिए ताकि फसल खराब होने से बच सके। इससे खाद्य आपूर्ति स्थिर रहेगी और कीमतों में तेज उछाल की संभावना कम होगी। इसके अलावा सरकार को तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए स्त्रोतों में विविधता बनाए रखनी चाहिए। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार करना चाहिए। सौर, पवन, हरित हाइड्रोजन और जैव ईंधन में निवेश बढ़ाना चाहिए। इलेक्ट्रिक वाहनों और सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन देना चाहिए। इससे अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों के झटकों का असर धीरे-धीरे कम होगा। वहीं रिजर्व बैंक को ब्याज दरों पर संतुलित निर्णय लेना चाहिए। अल नीनो से खाद्य उत्पादन प्रभावित हो और साथ ही मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण तेल महंगा रहे, तो खाद्य एवं ईंधन महंगाई बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार को कृषि आपूर्ति सुधार, ऊर्जा सुरक्षा, विवेकपूर्ण मौद्रिक नीति, लक्षित राजकोषीय सहायता और उत्पादक निवेश का संयोजन सबसे प्रभावी रणनीति ही अपनानी होगी।

