New Delhi,
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है और यह अब मध्य पूर्व संघर्ष शुरू होने के बाद के सबसे निचले स्तरों के करीब कारोबार कर रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच स्थिति सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य में पूरी तरह सामान्य स्थिति बहाल हो जाती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में आगे भी नरमी देखने को मिल सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में कई देश अपने भंडार को दोबारा भरने और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को संतुलित स्तर पर बनाए रखने के लिए खरीदारी बढ़ा सकते हैं। इससे बाजार में अतिरिक्त मांग पैदा होगी और कच्चे तेल की कीमतों में फिर से तेजी लौट सकती है।
पीएल कैपिटल (प्रभुदास लीलाधर) के विश्लेषकों के अनुसार, हाल के महीनों में ऊर्जा क्षेत्र को सबसे बड़े झटकों में से एक का सामना करना पड़ा, लेकिन अब अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर होने से बाजार में कुछ सकारात्मक संकेत दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, परमाणु समझौते को लेकर अब भी अनिश्चितता बनी हुई है। इस बीच, ब्रेंट कच्चा तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई है, जो March 2026 के बाद का सबसे निचला स्तर है। इससे ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।
पीएल कैपिटल में संस्थागत अनुसंधान के सह-प्रमुख स्वर्णेंदु भूषण के अनुसार, Q1 FY27 ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की लाभप्रदता पर गंभीर दबाव डाल सकता है। उनका अनुमान है कि इस अवधि में प्रति लीटर ₹.7 और ₹.10 की अंडर-रिकवरी हो सकती है। यह अनुमान प्रति लीटर ₹.10 की उत्पाद शुल्क कटौती तथा एमएस (पेट्रोल) और एचएसडी (हाई-स्पीड डीजल) के लिए क्रमशः 10 डॉलर और 15 डॉलर प्रति बैरल तक क्रैक मार्जिन सीमित रहने को ध्यान में रखकर लगाया गया है। विश्लेषकों का कहना है कि Q1 FY27 के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट से कुछ राहत अवश्य मिली, लेकिन ऊंची लागत और दबाव में रहे विपणन मार्जिन का असर इतना अधिक रहा कि पूरे तिमाही के प्रदर्शन को बेहतर नहीं बनाया जा सका। यही वजह है कि पूरे वित्तीय वर्ष की आय पर भी इसका असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की कमाई के लिए सबसे बड़ा जोखिम उत्पाद शुल्क में दी गई राहत को वापस लिया जाना है। हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और खुदरा ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी से विपणन मार्जिन में सुधार हुआ है, लेकिन यदि सरकार उत्पाद शुल्क में की गई कटौती को धीरे-धीरे वापस लेती है, तो कंपनियों की कमाई पर दोबारा दबाव बढ़ सकता है विश्लेषकों का मानना है कि उत्पाद शुल्क में कटौती स्थायी नीति के रूप में नहीं, बल्कि संकट के समय राहत देने के उद्देश्य से लागू की गई थी। अब जब कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित हो रही हैं, खुदरा ईंधन की कीमतें बढ़ चुकी हैं और विपणन मार्जिन सकारात्मक स्तर पर पहुंच रहे हैं, तो सरकार इस राहत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, निकट अवधि में बाजार की धारणा पहले की तुलना में बेहतर हुई है, लेकिन Q1 FY27 में संभावित घाटा और उत्पाद शुल्क कटौती वापस लिए जाने की आशंका के कारण पूरे FY27 के दौरान ऑयल मार्केटिंग कंपनियों की लाभप्रदता दबाव में रह सकती है। इसके अलावा, भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम में लगातार कमी आने से बाजार के प्रतिभागी निकट अवधि की आपूर्ति स्थिति का दोबारा आकलन कर रहे हैं। इसी वजह से क्षेत्रीय घटनाक्रम पर नजर बनाए रखने के बावजूद कच्चे तेल की कीमतों में नरमी बनी हुई है।

