अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरान पर लगाए गए समुद्री प्रतिबंधों के कारण चीन के साथ चल रहे सस्ते कच्चे तेल के व्यापारिक सौदों पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। स्काई न्यूज़ ऑस्ट्रेलिया की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान पर बने आर्थिक दबाव में और वृद्धि हुई है, जो संघर्ष विराम के बाद भी लगातार जारी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ईरान से कच्चा तेल बहुत कम कीमतों पर खरीदता था और इसके लिए एक अत्यंत गोपनीय वित्तीय तंत्र और पहचान बदलने वाले जहाज़ों का उपयोग किया जाता था। इस पूरी व्यवस्था में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसने शेल कंपनियों, छुपी बैंकिंग व्यवस्था और जहाज़ों की बदलती पहचान के जरिए अपने तेल राजस्व को वैश्विक वित्तीय प्रणाली से बाहर रखा। पहले अमेरिका इस नेटवर्क के अलग-अलग हिस्सों पर कार्रवाई करता था, लेकिन अब उसका लक्ष्य पूरे ढांचे को खत्म करना है। यह नेटवर्क चीन की मदद से विकसित हुआ था, जिसमें तीसरे देशों के माध्यम से भुगतान, गुप्त बैंकिंग प्रणाली और जहाज़ों की बार-बार पहचान बदलने की व्यवस्था शामिल थी।
चीन का “टीपॉट रिफाइनरी” क्षेत्र, जो छोटे तटीय रिफाइनरियों से बना है, ईरान के अधिकांश कच्चे तेल को प्रोसेस करता था। इसके जरिए ईरान को विदेशी मुद्रा मिलती थी, जिसका उपयोग मिसाइल, ड्रोन और हथियार आपूर्ति के लिए किया जाता था, जो क्षेत्रीय समूहों जैसे हिज़बुल्लाह, हमास और हूती विद्रोहियों तक पहुंचती थी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन ने ईरान को एक प्रयोग स्थल के रूप में इस्तेमाल किया ताकि वह भविष्य में इसी मॉडल को बड़े स्तर पर अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए उपयोग कर सके। आईआरजीसी ने जहाज़ों की पहचान बदलकर तेल की आपूर्ति चीन तक पहुंचाई। इसी नेटवर्क के जरिए चीन की बड़ी कंपनियों ने भी करोड़ों बैरल ईरानी तेल कम कीमतों पर प्राप्त किया, जो वैश्विक बाजार से काफी सस्ता था।
हाल ही में अमेरिका ने इस पूरे नेटवर्क पर कड़ा कदम उठाते हुए 35 संस्थाओं और व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाया है और 19 छाया बेड़े के जहाज़ों को भी निशाना बनाया है। इस घटनाक्रम का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिख रहा है। Stock Market Update के अनुसार ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है, जिससे Nifty और Sensex में निवेशकों की सतर्कता देखी जा रही है।

