New Delhi,
भारत की कुल आर्थिक स्थिति फिलहाल स्थिर बनी हुई है, भले ही ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी देखी जा रही हो। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, आगामी वित्त वर्ष FY27 में देश के बाहरी संतुलन को तय करने में कच्चे तेल की कीमतें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। ब्रिकवर्क रेटिंग्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है, तो भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है। वर्तमान में यह घाटा सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.3 प्रतिशत आंका गया है। रिपोर्ट के अनुसार, हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि पर चालू खाता घाटा करीब 50 आधार अंक तक बढ़ सकता है। यदि कीमतों में 15 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है, तो यह घाटा 1.9 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जबकि 40 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि की स्थिति में यह लगभग 3.5 प्रतिशत तक जा सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सबसे पहला असर भारत के बाहरी क्षेत्र पर पड़ेगा, क्योंकि इससे देश का आयात बिल बढ़ेगा। भारत ऊर्जा के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, जिससे व्यापार संतुलन पर लगातार दबाव बना रह सकता है।
महंगाई और विकास पर असर
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से आर्थिक विकास और महंगाई दोनों प्रभावित हो सकते हैं। यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो नीति निर्माताओं को महंगाई को नियंत्रित करने और विकास को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना होगा। वर्तमान में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर लगभग 4.2 प्रतिशत आंकी गई है। मध्यम स्तर की तेल कीमत वृद्धि के साथ यह बढ़कर करीब 4.65 प्रतिशत तक जा सकती है, जबकि तेज बढ़ोतरी की स्थिति में यह लगभग 5.85 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
रुपये पर दबाव और आयात महंगा होने का खतरा
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ेगा। कीमतों में मध्यम वृद्धि की स्थिति में रुपया प्रति डॉलर लगभग 93 के स्तर तक कमजोर हो सकता है, जबकि तेज बढ़ोतरी होने पर यह करीब 95.8 प्रति डॉलर तक जा सकता है। रुपये के कमजोर होने से आयात महंगा हो जाएगा, जिससे महंगाई पर और दबाव बढ़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर stock market update पर भी दिखाई दे सकता है। इससे निवेशकों की धारणा प्रभावित हो सकती है और बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है।

