भले ही, दुनिया में चौधराहट बनाये रखने और साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए अमेरिका ने इस्राइल के साथ मिलकर ईरान पर युद्ध थोपा हो, मगर इस युद्ध के दूरगामी घातक परिणाम पूरी दुनिया को झेलने होंगे। इस संघर्ष ने पूरे पश्चिमी एशिया को गहरे संकट में डाल दिया है। तबाही के कगार पर खड़े ईरान ने जिस तरह अपने पड़ोसी देशों के व्यापारिक व औद्योगिक संस्थानों पर ताबड़-तोड़ हमले किए हैं, उससे मध्यपूर्व में बड़ा आर्थिक संकट पैदा हो गया है। लाखों लोगों के रोजगार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। खासकर लाखों भारतीय कामगारों के लिये बड़ा संकट पैदा हो गया है। ईरान की जवाबी कार्रवाई से पश्चिमी एशिया में बढ़ते संकट से, इस क्षेत्र में आर्थिक उथल-पुथल मची हुई है। दुनिया के प्रमुख वैश्विक जहाजरानी मार्गों पर मंडरा रहे खतरे के बीच ऊर्जा बाजार की स्थिति पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हुए हमलों के कारण कच्चे तेल और द्रवीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की ढुलाई पहले ही बाधित हो चुकी है। उल्लेखनीय है कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लगभग पांचवें हिस्से के लिये एक रणनीतिक मार्ग है, लेकिन मौजूदा युद्ध से उपजे हालात में जहाज बीमा कंपनियों ने युद्ध-जोखिम कवरेज वापस ले लिया है। इसके चलते पेट्रोलियम पदार्थों व अन्य उत्पादों की माल ढुलाई लागत बढ़ रही है। युद्ध की विभीषिका के चलते तमाम जहाजों ने अपने मार्ग बदल लिए हैं। कुछ जहाज चलाने वाली कंपनियों ने अपने जहाजों के परिचालन पर रोक लगा दी है। इसका तात्कालिक परिणाम यह है कि कच्चे तेल की कीमतों में काफी उछाल देखा जा रहा है। जिसके चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जा रही है। इसमें दो राय नहीं कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें आने वाले दिनों में विश्व स्तर पर मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ाएंगी। जाहिरा तौर पर विकासशील व गरीब देशों का आर्थिक संकट और गहरा हो जाएगा।

