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‘Documentary films में नैतिकता’ पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन

by Business Remedies
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बिजऩेस रेमेडीज/जयपुर   JECRC University के जयपुर स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन द्वारा ‘Documentary films में नैतिकता’ विषय पर 6 मई को एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार में यूके, इटली और भारत समेत कई देशों से आए प्रतिष्ठित फिल्ममेकर्स और एक्सपर्ट्स शामिल हुए। आयोजन का उद्देश्य डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में नैतिकता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना रहा।
इस आयोजन में डॉ. अग्नियोस्का पियोट्रोस्का (फाउंडर, द स्कॉलर्स मेंटर, द यूके), डॉ. जिल डेनियल्स (फिल्म प्रोफ़ेसर, यूनिवर्सिटी ऑफ लंडन), डॉ. डोमिनिक लीज़ (प्रोफ़ेसर, यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग, द यूके), डॉ. क्रिस्टिना फोरमेंटी (असिस्टेंट प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी ऑफ उडीन, इटली), डॉ अगाता लुलकोस्का (एसोसिएट प्रोफेसर, स्टेफोर्डशायर यूनिवर्सिटी), डॉ प्रियंका सिंह (लेक्चरर, यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स), डॉ एमिली कोलमैन (पोस्टडॉक्टरल फेलो, किंग्स कॉलेज, लंडन) और डॉ नरेंद्र कौशिक (डीन, स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन, JECRC University) शामिल रहे।
कार्यक्रम के दौरान कई महत्वपूर्ण विषयों पर संवाद हुए, जैसे कि फिल्मों में नैतिकता, विषयों की सूचित सहमति, गरीब प्रतिभागियों के साथ लाभ-साझेदारी, वॉयस-ओवर नैरेशन के नैतिक प्रभाव, हाशिए पर पड़े समुदायों का विदेशीकरण या गलत चित्रण, उपनिवेशवाद के इतिहास का प्रभाव, घटनाओं को मंचित करने, डॉक्युमेंट्री फिल्मों में वैश्विक वृद्धि और भारत में इसका विकास। उपस्थित विशेषज्ञों ने इन सभी मुद्दों पर गहराई से विचार साझा किए।
इस मौके पर डॉ. एग्निएस्का प्नेयाट्रोवस्का ने डॉक्यूमेंट्री और नैतिकता के बीच के रिश्ते को लेकर अपने अनुभव साझा किए। डॉ. जिल डेनियल्स ने स्मृति, इतिहास और डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण में नैतिकता की भूमिका को रेखांकित किया। डॉ. डोमिनिक लीज़ ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और फिल्म निर्माण के संगम से जुड़े नैतिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। वहीं डॉ. क्रिस्टिना फोरमेंटी ने एनीमेटेड डॉक्यूमेंट्रीज और कल्पना बनाम सच्चाई के संतुलन पर विचार रखे। डॉ. नरेंद्र कौशिक ने अपने संबोधन में कहा कि आज के दौर में मीडिया शिक्षा का मकसद सिर्फ तकनीकी जानकारी देना नहीं है, बल्कि छात्रों में सामाजिक जिम्मेदारी और नैतिक सोच भी विकसित करना है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन छात्रों को सोचने और समाज के प्रति उत्तरदायी बनने के लिए प्रेरित करते हैं। सेमिनार में यह भी बताया गया कि डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। दो दशक पहले जहां वैश्विक स्तर पर लगभग 3,600 डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनती थीं, वहीं 2020 में यह आंकड़ा 11,000 से अधिक हो गया। भारत में भी यह संख्या 47 से बढक़र 247 हो गई है, जो इस श्रेणी के प्रति दर्शकों और फिल्मकारों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है।
JECRC University के प्रो. डी. पी. मिश्रा (पूर्व अध्यक्ष, प्रोफेसर एमेरिटस एवं वरिष्ठ सलाहकार) ने बताया कि डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के माध्यम से सच्चाई को सामने लाना एक बड़ी जिम्मेदारी है। इस सेमिनार के जरिए स्टूडेंट्स और फिल्मकारों को यह समझने का अवसर मिला कि एक कहानी को कहने के पीछे कितनी नैतिकता, संवेदनशीलता और सोच जरूरी होती है। इस विचार-विमर्श से भरे आयोजन ने डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की ताकत, जिम्मेदारी और संभावनाओं को नए नजरिए से देखने का अवसर दिया। विद्यार्थियों और प्रतिभागियों ने कार्यक्रम से महत्वपूर्ण सीख लेते हुए इसे एक प्रेरणादायक अनुभव बताया।



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