बिजऩेस रेमेडीज/जयपुर Indian Agriculture में महिलाओं की भूमिका अब केवल सहयोगी की नहीं, बल्कि नेतृत्वकारी बनती जा रही है। वे खाद्य सुरक्षा की रीढ़ बन रही हैं, जलवायु-संवेदनशील तकनीकों को अपना रही हैं और गांवों में नवाचार की सूत्रधार बन रही हैं। इसी दिशा में एक अहम पहल करते हुए Corteva Agriscience जो कृषि विज्ञान और नवाचार में वैश्विक नेतृत्वकर्ता है ने जयपुर में ‘महिला किसानों को सक्षम बनाना: ज़मीन पर परिवर्तनकारी असर’ विषय पर उच्चस्तरीय संवाद का आयोजन किया।
इस संवाद में देशभर के विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और सामाजिक नवप्रवर्तकों ने हिस्सा लिया और इस बात पर सहमति जताई कि महिलाओं का कृषि मूल्य श्रृंखला में सशक्तिकरण, ग्रामीण समृद्धि, खाद्य सुरक्षा और जलवायु लचीलापन के लिए अनिवार्य है।
महिलाएं अब सिर्फ खेतों में काम करने वाली नहीं रहीं, बल्कि वे किसान उत्पादक संगठनों का नेतृत्व कर रही हैं, स्मार्ट टेक्नोलॉजी अपना रही हैं और खेती के निर्णयों में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं।
राजस्थान सरकार के जल संसाधन योजना मंत्री सुरेश सिंह रावत ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय कृषि की आत्मा हमेशा से महिलाएं रही हैं। वे न केवल भूमि को संवारती हैं, बल्कि परिवारों का पालन-पोषण करती हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति भी देती हैं। आज उनके योगदान का दायरा पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में राजस्थान सरकार समावेशी कृषि विकास की पक्षधर बनकर महिलाओं को आत्मनिर्भर किसान के रूप में सशक्त बना रही है। प्रगतिशील नीतियों, क्षमता विकास और बाजार व तकनीक तक पहुंच जैसे उपायों के ज़रिए महिला किसानों को आगे बढ़ाया जा रहा है। यह संवाद हमारे उस संकल्प को फिर से पुष्ट करता है, जिसमें हम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने में महिलाओं की अमूल्य भूमिका को पहचानते हैं और उसे और प्रखर बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। एसकेएनएयू-जॉबनेर, जयपुर के कुलपति प्रो. (डॉ.) बलराज सिंह इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थे।
राउंड टेबल मीटिंग में शामिल प्रमुख वक्ता :
डॉ. शुचि माथुर, सहायक निदेशक, सीसीएस एनआईएएम, जयपुर।
लकेश चौधरी, राज्य समन्वयक (प्राकृतिक खेती), भाजपा राजस्थान; निदेशक, सारथी एजुकेशनल ट्रस्ट।
पायलट नीरज सहरावत, राष्ट्रीय प्रभारी, शोध व नीति, भाजपा किसान मोर्चा।
डॉ. मुकेश केस्टवाल, चीफ इनोवेशन ऑफिसर, आईआईटी रोपड़।
डॉ. कमलेश सिंह, प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, आईआईटी दिल्ली।
वक्ताओं ने एकमत होकर कहा कि कृषि में महिलाओं को सशक्त बनाना सिर्फ समानता का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की रणनीतिक आवश्यकता है। जब महिलाएं ज्ञान, संसाधन और नेतृत्व के अवसरों से सशक्त होती हैं, तो वे पूरे समुदाय को आगे बढ़ा सकती हैं।
Corteva की प्रतिबद्धता: पहचान से आगे, एक्शन तक : Corteva का दृष्टिकोण महज सराहना तक सीमित नहीं है। कंपनी की ‘2030 तक 20 लाख महिला किसानों को सशक्त बनाने’ की पहल इस विश्वास पर आधारित है कि स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब महिलाएं निर्णयकर्ता, नवप्रवर्तक और नेता बनें।
भारत में यह विजऩ इन पहलों के ज़रिये आगे बढ़ रहा है
महिला-नेतृत्व वाले एफपीओ को सशक्त कर बाजार व वित्तीय संसाधनों से जोडऩा
स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार जलवायु-लचीले प्रशिक्षण और डिजिटल उपकरण प्रदान करना
वित्तीय साक्षरता और उद्यमिता को ढ़ावा देना
जमीनी स्तर पर काम कर रहे संगठनों और एनजीओ के साथ साझेदारी
कृषि-एसटीईएम में अगली पीढ़ी की महिला नेताओं को मेंटर करना
राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से तालमेल : संवाद के दौरान भारत सरकार, विशेषकर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की उस नीति की भी सराहना की गई जिसमें महिलाओं को कृषि विकास के केंद्र में रखा गया है। 2027-28 तक 10,000 एफपीओ स्थापित करने का लक्ष्य महिलाओं को संगठित नेतृत्व व आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा अवसर प्रदान करता है।
भविष्य की दिशा : सरकार, समुदाय और संस्थानों के साथ मिलकर Corteva Agriscience भारत में ऐसा कृषि पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है, जहां महिलाएं सशक्त, मान्यता प्राप्त और सक्षम हों और वे भारत की कृषि में अगले बड़े बदलाव की अगुवाई करें।

