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‘फिटपैक’ 50 वर्षों का स्वर्णिम सफर

पांच दशक में पैकेजिंग और सिलाई समाधान का विस्तार; अब ढ्ढशञ्ज सेंसर और ऊर्जा दक्ष मशीनें प्राथमिकता

by Business Remedies
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एक नजर में
– शुरुआत: वर्ष 1976, जयपुर
– कारोबार के चार क्षेत्र: पैकेजिंग मशीनें, इंडस्ट्रियल सिलाई मशीनें, औद्योगिक धागे और पीपी/बीओपीपी बोरियां
– ग्राहक: कंपनी के अनुसार 10 हजार से अधिक
– अगली प्राथमिकता: ढ्ढशञ्ज आधारित निगरानी और ऊर्जा दक्ष तकनीक

जयपुर | बिजनेस रेमेडीज
वर्ष 1976 में जयपुर से शुरू हुई सुरेंद्र कुमार एंड कंपनी का कारोबार आज फिटपैक गु्रप के रूप में पैकेजिंग और औद्योगिक सिलाई के कई क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। पांच दशक की यात्रा में समूह ने पारंपरिक सिलाई उपकरणों से आगे बढक़र ऑटोमैटिक पैकेजिंग मशीनों, औद्योगिक धागों और पैकिंग बोरियों को अपनी उत्पाद श्रृंखला में जोड़ा। अब कंपनी अपने विजन 2030 के तहत मशीनों की डिजिटल निगरानी और ऊर्जा दक्ष तकनीक पर काम कर रही है।
छोटी शुरुआत, बदलती जरूरतें
संस्थापक सुरेंद्र कुमार गुप्ता ने 1976 में सीमित संसाधनों के साथ काम शुरू किया था। उस समय कई छोटे उद्योगों में पैकिंग और सिलाई के काम हाथों से होते थे। कंपनी ने शुरुआती दौर में औद्योगिक सिलाई और पैकेजिंग के बुनियादी उपकरण उपलब्ध कराए। उद्योगों का आकार बढऩे के साथ उनकी जरूरतें भी बदलीं। 1980 और 1990 के दशक में फिटपैक ने बैग क्लोजिंग मशीनों तथा मजबूत सिलाई धागों के कारोबार में विस्तार किया। समूह के अनुसार इसी दौर ने उसे उत्पादन इकाइयों की व्यावहारिक जरूरतों को समझने का अवसर दिया।
ऑटोमेशन से मिला नया विस्तार
वर्ष 2000 के बाद पैकेजिंग उद्योग में मशीनों के जरिए उत्पादन बढ़ाने की मांग तेज हुई। फिटपैक ने सेमी-ऑटोमैटिक और ऑटोमैटिक मशीनों को अपनी श्रृंखला में शामिल किया। कंपनी आज फिलिंग, पाउच पैकिंग, सीलिंग, वैक्यूम पैकिंग, श्रिंक रैपिंग और कोडिंग जैसे कामों के लिए उपकरण उपलब्ध कराती है। उसके अनुसार अलग-अलग उत्पादों की पैकिंग में वजन, गति और सीलिंग की जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए मशीन का चुनाव उत्पाद और इकाई की उत्पादन क्षमता को देखकर किया जाता है।
पैकेजिंग में कई विकल्प
चिप्स, नमकीन और ड्राय फू्रट्स जैसे उत्पादों की पैकिंग में वजन तय करने के लिए मल्टी हेड वेगर उपयोगी है। पाउच पैकिंग के लिए पिक-फिल-सील मशीनें और आटा, बेसन या मसालों की पैकिंग के लिए ऑगर फिलर कंपनी की उत्पाद श्रृंखला का हिस्सा हैं। खाद्य पदार्थों की पैकिंग में वैक्यूम पैकर्स और कैन सीलिंग मशीनों के विकल्प भी उपलब्ध हैं। फिटपैक का कहना है कि मशीनों के साथ इंस्टॉलेशन और तकनीकी सहायता देने पर भी उसका ध्यान रहता है, ताकि इकाइयां उन्हें अपनी उत्पादन प्रक्रिया में शामिल कर सकें।
सिलाई, धागे और बोरियां
पैकेजिंग मशीनों के अलावा समूह तीन अन्य प्रमुख क्षेत्रों में काम करता है। गारमेंट और टेक्सटाइल इकाइयों के लिए इंडस्ट्रियल सिलाई मशीनें उपलब्ध कराई जाती हैं। बोरियों का मुंह बंद करने वाली मशीनें अनाज और अन्य थोक उत्पादों की पैकिंग में काम आती हैं। लगातार चलने वाली सिलाई मशीनों के लिए औद्योगिक धागों की मजबूती अहम होती है। कंपनी इस जरूरत के अनुसार धागे भी उपलब्ध कराती है। चौथा क्षेत्र पीपी और बीओपीपी की बुनी हुई बोरियों का है, जिनका उपयोग अनाज, खाद, सीमेंट और अन्य उत्पादों के भंडारण तथा परिवहन में होता है।
कारोबार के पीछे टीम
सुरेंद्र कुमार गुप्ता के अनुसार कारोबार की शुरुआत और आगे के विस्तार में परिवार, कर्मचारियों तथा ग्राहकों का सहयोग महत्वपूर्ण रहा। शुरुआती चुनौतियों के बीच टीम ने नई तकनीक और बाजार की बदलती मांग के हिसाब से काम किया। समूह के निदेशकों में पुनीत गुप्ता, गिरीश गुप्ता और सौरभ गुप्ता शामिल हैं। कंपनी का दावा है कि वह अब तक 10 हजार से अधिक ग्राहकों को सेवाएं दे चुकी है और उसके साथ 100 से अधिक पेशेवर व इंजीनियर जुड़े हैं। समूह के अनुसार जयपुर स्थित प्लांट में मशीनों की जांच और लोड टेस्टिंग की जाती है।
विजन 2030: मशीनों की डिजिटल निगरानी
अब फिटपैक उत्पादन के साथ मशीन की कार्यस्थिति पर नजर रखने वाली तकनीक को आगे बढ़ा रही है। कंपनी के विजन 2030 में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (ढ्ढशञ्ज) सेंसरों का उपयोग शामिल है। योजना के अनुसार फैक्ट्री संचालक मोबाइल पर देख सकेंगे कि मशीन कितनी देर चली, कितना उत्पादन हुआ और उसे सर्विस की जरूरत कब है। कंपनी का मानना है कि ऐसी जानकारी से मशीनों के रखरखाव की योजना बनाने और काम रुकने का समय घटाने में मदद मिल सकती है।
ऊर्जा दक्षता पर जोर
समूह सर्वो मोटर आधारित तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने की भी योजना बना रहा है। कंपनी के अनुसार इसका उद्देश्य बिजली की खपत घटाते हुए मशीनों की गति और कार्यकुशलता बेहतर करना है। पैकेजिंग उद्योग में उत्पादन लागत और ऊर्जा उपयोग दोनों महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। ऐसे में फिटपैक की अगली चुनौती नई तकनीक को अलग-अलग आकार की उत्पादन इकाइयों के लिए उपयोगी बनाना होगी। वर्ष 1976 में बुनियादी औद्योगिक जरूरतों से शुरू हुआ उसका सफर अब डिजिटल और ऊर्जा दक्ष मशीनों की दिशा में बढ़ रहा है।



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