हर वर्ष की भांति आज विश्व पोलियो दिवस मनाया जाएगा। यह दिवस पोलियो जैसी गंभीर संक्रामक बीमारी के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने, बच्चों को जीवनभर की विकलांगता से बचाने और दुनिया को पोलियो मुक्त बनाने के संकल्प को दोहराने का अवसर है। पोलियो उन्मूलन के लिए व्यापक टीकाकरण, स्वास्थ्यकर्मियों की प्रतिबद्धता और समाज की भागीदारी आवश्यक है। भारत ने इस दिशा में बेहतर सफलता हासिल की है, लेकिन इस उपलब्धि को स्थायी बनाए रखना आज भी बड़ी चुनौती है। इस दिवस को मनाने की शुरुआत वर्ष, 2009 में रोटरी इंटरनेशनल की पहल से हुई। यह तिथि जोनास साल्क की जयंती के उपलक्ष्य में चुनी गई, जिन्होंने पोलियो के विरुद्ध प्रभावी टीका विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पोलियो मुख्यत: छोटे बच्चों को प्रभावित करने वाला विषाणुजनित रोग है, जो कुछ मामलों में स्थायी लकवे का कारण बन सकता है। इसका कोई विशिष्ट उपचार नहीं है। पर टीकाकरण ही बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम है। भारत में पोलियो उन्मूलन की दिशा में केंद्र और राज्य सरकारों ने व्यापक अभियान चलाए है। वर्ष, 1995 में पल्स पोलियो कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसके अंतर्गत पांच वर्ष तक के बच्चों को घर-घर जाकर पोलियो की खुराक पिलाई गई। सरकार, विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और रोटरी इंटरनेशनल सहित अनेक संस्थाओं के सहयोग से यह अभियान जन-आंदोलन बना। भारत में जंगली पोलियो वायरस का अंतिम मामला 13 जनवरी, 2011 को सामने आया था। इसके बाद लगातार निगरानी और टीकाकरण के आधार पर 27 मार्च, 2014 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत सहित दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को पोलियो मुक्त प्रमाणित किया। वर्तमान में नियमित टीकाकरण कार्यक्रम, पल्स पोलियो अभियान, मिशन इंद्रधनुष तथा सघन निगरानी व्यवस्था इस उपलब्धि को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भारत जंगली पोलियो वायरस से मुक्त होने का दर्जा पहले ही प्राप्त कर चुका है, पर वैश्विक स्तर पर पोलियो का पूर्ण उन्मूलन अभी बाकी है। इसकी कोई निश्चित अंतिम तिथि घोषित नहीं की जा सकती। जब तक दुनिया के सभी देशों में वायरस का प्रसार समाप्त नहीं होता, भारत को अपनी सतर्कता बनाए रखनी होगी।

