देश में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि करने के उद्देश्य से एथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहन दिया गया था। इस नीति के तहत चीनी उद्योग ने बड़े पैमाने पर निवेश कर उत्पादन क्षमता का विस्तार किया, लेकिन अब केंद्र सरकार की नई एथेनॉल खरीद नीति ने इस क्षेत्र के सामने गंभीर आर्थिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों के चीनी कारखानों और एथेनॉल उत्पादन इकाइयों में इस फैसले को लेकर चिंता बढऩा स्वाभाविक है। उद्योग जगत के अनुसार, नई व्यवस्था से एथेनॉल क्षेत्र में किए गए लगभग 40,000 करोड़ रुपए के निवेश पर संकट मंडराने लगा है। गन्ने के रस, शुगर सिरप और बी-हेवी मोलासेस से उत्पादित एथेनॉल की खरीद पर रोक तथा सरकार के 1,100 करोड़ लीटर के खरीद लक्ष्य से गन्ना-आधारित स्रोतों को बाहर रखना, उद्योग की आर्थिक गणना को प्रभावित कर सकता है। अब केवल सी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल की खरीद की व्यवस्था से उत्पादकों के सामने लाभप्रदता बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। सरकार की चिंता यह हो सकती है कि चीनी उत्पादन पर्याप्त बना रहे और खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यह उद्देश्य निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। चीनी की घरेलू मांग, कीमतों की स्थिरता और उपलब्धता को ध्यान में रखकर नीतिगत निर्णय लेना आवश्यक है, लेकिन ऊर्जा नीति, कृषि नीति और औद्योगिक निवेश को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यदि एक ओर सरकार उद्योग को एथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करे और दूसरी ओर खरीद के नियमों में अचानक बदलाव कर दे तो निवेशकों का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है। विशेष चिंता यह है कि मौजूदा बाजार कीमतों पर केवल सी-हेवी मोलासेस से एथेनॉल उत्पादन आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं माना जा रहा। ऐसी स्थिति में कारखानों की क्षमता का पूरा उपयोग कठिन होगा, निवेश पर प्रतिफल घट सकता है और किसानों के गन्ना भुगतान पर भी अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है। रोजगार तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसके संभावित प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए केंद्र सरकार को चीनी उत्पादन और एथेनॉल उद्योग के हितों के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए। खरीद नीति में अचानक बदलाव के बजाय चरणबद्ध व्यवस्था, स्पष्ट दीर्घकालिक दिशा-निर्देश और उद्योग से सार्थक संवाद जरूरी हैं। गन्ना-आधारित एथेनॉल की खरीद के लिए उत्पादन और चीनी उपलब्धता से जुड़ी व्यावहारिक सीमाएं तय की जा सकती हैं। नीति की सफलता केवल चीनी उत्पादन बनाए रखने में नहीं, बल्कि किसानों, उद्योग और ऊर्जा सुरक्षा के साझा हितों को साधने में है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि अल्पकालीन नीतिगत बदलावों की कीमत दीर्घकालीन निवेश और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को न चुकानी पड़े।

