चारू भाटिया | जयपुर
रैना कुमरा, स्पाइसवेल की संस्थापक एवं सीईओ, पारंपरिक आयुर्वेदिक सिद्धांतों और आधुनिक पोषण संबंधी नवाचारों को जोड़कर खाद्य एवं वेलनेस उद्योग को एक नई दिशा देने का प्रयास कर रही हैं। सिलिकॉन वैली में एक भारतीय–अमेरिकी परिवार में जन्मीं रैना ने वर्ष 2021 में स्पाइसवेल की शुरुआत की। उन्हें इस पहल की प्रेरणा अपनी मां और दादी से मिली आयुर्वेदिक परंपराओं से मिली। उनकी कंपनी रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले नमक और काली मिर्च जैसे मसालों में जैविक फलों और सब्जियों से प्राप्त विटामिन एवं खनिजों को शामिल करने पर केंद्रित है। उद्यमिता की दुनिया में कदम रखने से पहले रैना ने फिल्म निर्माण, विज्ञापन, वेंचर निवेश और अमेरिका की सरकारी व्यवस्था में काम करने सहित कई क्षेत्रों में अनुभव हासिल किया। उन्होंने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन के दौरान भी काम किया और अल्फाबेट की नवाचार इकाई गूगल एक्स को सलाह दी। स्पाइसवेल के माध्यम से उनका उद्देश्य पारंपरिक खाद्य ज्ञान को आधुनिक रसोई तक पहुंचाना और पोषण को लोगों के दैनिक जीवन का सहज हिस्सा बनाना है।
चारू भाटिया: आपने अपने पेशेवर जीवन में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन अपनी जड़ों से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। अपनी यात्रा और स्पाइसवेल के सफर के बारे में बताइए। इस पहल को शुरू करने की प्रेरणा कहां से मिली?
रैना कुमरा: मुझे बेहद खुशी है कि मैं भारत के साथ अपना जुड़ाव बनाए रख पा रही हूँ। आयुर्वेद को समझने और सीखने की मेरी यात्रा
कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुई। उस समय मेरे पति को घुटने की सर्जरी की जरूरत थी और लगभग उसी दौरान मेरी बेटी की कॉलरबोन यानी हंसली की हड्डी भी टूट गई। हमारे परिवार के लिए वह काफी चुनौतीपूर्ण समय था। ऐसे में मैंने अपनी दादी से सीखे आयुर्वेदिक तरीकों की ओर रुख किया।
मैंने अपने परिवार के रोजमर्रा के भोजन में हल्दी, अदरक, केल और पालक जैसी सामग्रियों को शामिल करना शुरू किया। इस अनुभव ने मुझे भोजन, पोषण और स्वास्थ्य के बीच संबंध को अधिक गहराई से समझने के लिए प्रेरित किया। मुझे यह भी महसूस हुआ कि लोगों को नियमित रूप से कुछ खास सब्जियां खिलाना आसान नहीं होता। ऐसे में पौष्टिक सामग्रियों को भोजन में इस तरह शामिल करना उपयोगी हो सकता है कि उनका सेवन सहज हो जाए और उनके पोषण संबंधी गुण भी बरकरार रहें।
स्पाइसवेल शुरू करने से पहले मैंने कई क्षेत्रों में शिक्षा और अनुभव हासिल किया। मैंने बोस्टन यूनिवर्सिटी से फिल्म निर्माण की पढ़ाई की, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के इंटरैक्टिव टेलीकम्युनिकेशंस प्रोग्राम में अध्ययन किया और हार्वर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ डिजाइन में भी पढ़ाई की। मैंने एक दशक से अधिक समय तक वैश्विक ब्रांडों के लिए डिजिटल विज्ञापन के क्षेत्र में काम किया और डिजिटल रणनीति तथा नवाचार से जुड़ी नेतृत्वकारी भूमिकाएं भी निभाईं।
ओबामा प्रशासन के दौरान मैंने ब्रॉडकास्टिंग बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में को–डायरेक्टर ऑफ इनोवेशन के रूप में काम किया। इसके अलावा, अमेरिकी विदेश विभाग में राजनयिक नवाचार से जुड़े कार्यों का अनुभव भी हासिल किया। बाद में मैं बाइडन–हैरिस ट्रांजिशन टीम का हिस्सा बनी, जहां अमेरिकी ग्लोबल मीडिया की तकनीकी रणनीति से जुड़े काम पर ध्यान दिया। मैंने किफायती इंटरनेट पहुंच पर केंद्रित मोबाइल स्टार्टअप मेविन की सह–स्थापना की, अल्फाबेट की नवाचार इकाई एक्स को सलाह दी और कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के प्रमाणपत्र कार्यक्रम के माध्यम से पादप चिकित्सा का अध्ययन भी किया।
कई वर्षों तक मेरा पेशेवर जीवन उत्पादों की बिक्री और रणनीतियां विकसित करने के इर्द–गिर्द घूमता रहा। लेकिन समय के साथ मुझे लगा कि मुझे कुछ अधिक अर्थपूर्ण करना चाहिए। मैं भारतीय–अमेरिकी हूं और मेरी जड़ें पंजाब से जुड़ी हैं। मैं उस पारंपरिक ज्ञान से फिर जुड़ना चाहती थी, जिसके बीच मैं बड़ी हुई थी। इसी सोच ने मुझे स्पाइसवेल तक पहुंचाया। फिलहाल हमारे दो प्रमुख उत्पाद नमक और काली मिर्च हैं, जिनका उद्देश्य रोजमर्रा के भोजन में अतिरिक्त पोषण शामिल करना है।
चारू भाटिया: खाद्य और वेलनेस उद्योग में ऐसी कौन–सी कमियां थीं, जिन्हें देखकर आपने स्पाइसवेल की स्थापना करने का निर्णय लिया?
रैना कुमरा: जब मैंने औपचारिक रूप से पादप चिकित्सा का अध्ययन शुरू किया, तो मेरी रुचि इस बात में बढ़ी कि हमारी पारंपरिक औषधियों की उत्पत्ति कहां से हुई और भोजन हमारे स्वास्थ्य में किस प्रकार योगदान देता है। मैंने फलों और सब्जियों के पोषण मूल्य, कृषि भूमि की बदलती गुणवत्ता और रोजमर्रा के आहार से पर्याप्त पोषक तत्व प्राप्त करने में आने वाली चुनौतियों के बारे में अध्ययन करना शुरू किया।
मुझे महसूस हुआ कि पोषण को देखने के हमारे तरीके पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। कई लोग अच्छा और संतुलित भोजन करने का प्रयास करते हैं, लेकिन फिर भी उनके शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते। मैं इस चुनौती का बड़े स्तर पर समाधान तलाशना चाहती थी। मेरा उद्देश्य ऐसा उत्पाद बनाना नहीं था, जिसका इस्तेमाल लोग कभी–कभार करें, बल्कि ऐसा विकल्प तैयार करना था जिसे वे अपनी रोजमर्रा की आदतों में आसानी से शामिल कर सकें।
इसीलिए हमने नमक और काली मिर्च से शुरुआत की। ये ऐसे परिचित उत्पाद हैं, जिनका इस्तेमाल रोजाना खाना पकाने में होता है, खासकर अमेरिकी बाजार में। हमारा लक्ष्य ऐसे विकल्प तैयार करना था, जिनमें सोडियम की मात्रा कम हो और पोषण संबंधी लाभ अधिक हों। हम स्वाद से समझौता किए बिना लोगों को अतिरिक्त पोषक तत्व देना चाहते थे, ताकि उन्हें अपनी खाना पकाने की आदतों में कोई बड़ा बदलाव न करना पड़े।
हमारा फॉर्मूला है कि हर आधा चम्मच नमक या काली मिर्च में सब्जियों की एक सर्विंग के बराबर पोषण शामिल होता है। हमने ब्रोकली, केल, केल्प (समुद्री शैवाल), ब्रसेल्स स्प्राउट्स और टमाटर सहित कुल नौ सब्जियों को मिलाकर यह मिश्रण तैयार किया है। हमारा व्यापक विचार भोजन को अधिक पोषण–केंद्रित बनाना और परिचित सामग्रियों के माध्यम से लोगों को अपने दैनिक आहार में अतिरिक्त पोषक तत्व शामिल करने का अवसर देना है।
चारू भाटिया: आपने भारत और अमेरिका, दोनों देशों की खाद्य संस्कृतियों को करीब से देखा है। दोनों देशों के खानपान में आपको क्या अंतर दिखाई देता है?
रैना कुमरा: दोनों देशों के खानपान में कई अंतर हैं, हालांकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दोनों जगह लोगों की खानपान संबंधी आदतें काफी विविध हैं। अमेरिकी खाद्य संस्कृति में सुविधा, एकरूपता और मानकीकृत भोजन पर अक्सर अधिक जोर दिया जाता है। दूसरी ओर, भारतीय भोजन में जड़ी–बूटियों, मसालों, सब्जियों और क्षेत्रीय व्यंजनों की असाधारण विविधता देखने को मिलती है।
भारतीय व्यंजन विशेष रूप से दिलचस्प हैं, क्योंकि यहां सामग्रियों का इस्तेमाल केवल स्वाद बढ़ाने के लिए नहीं किया जाता। कई मसाले और जड़ी–बूटियां पीढ़ियों से पारंपरिक स्वास्थ्य संबंधी मान्यताओं और घरेलू प्रथाओं का हिस्सा रही हैं। हल्दी और अदरक इसके परिचित उदाहरण हैं।
आज की खाद्य व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि सुविधा के कारण भोजन की पोषण गुणवत्ता से समझौता न हो। मिट्टी का स्वास्थ्य, खेती के तरीके, खाद्य प्रसंस्करण और वितरण जैसी चीजें हमारे भोजन में उपलब्ध पोषक तत्वों को प्रभावित कर सकती हैं। ये मुद्दे भारत और अमेरिका, दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। हमें इस बात पर अधिक ध्यान देना होगा कि हमारा भोजन कैसे उगाया और तैयार किया जाता है।
चारू भाटिया: विटामिन और नमक आपके उत्पादों की अवधारणा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। शरीर में इनकी क्या भूमिका है और स्पाइसवेल के दृष्टिकोण में इनका क्या महत्व है?
रैना कुमरा: विटामिन शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं। इनमें मेटाबॉलिज्म, प्रतिरक्षा प्रणाली और ऊतकों के स्वस्थ रखरखाव जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। अलग–अलग विटामिन के अलग–अलग कार्य होते हैं और शरीर को इनकी उचित मात्रा में आवश्यकता होती है।
नमक में मौजूद सोडियम भी एक आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट है। यह शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है और तंत्रिका संकेतों तथा मांसपेशियों के कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, सोडियम का अत्यधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है, इसलिए इसका सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए।
स्पाइसवेल में हमारा व्यापक दृष्टिकोण रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों पर नए सिरे से विचार करना है। हम यह तलाशना चाहते हैं कि परिचित उत्पाद बेहतर पोषण संबंधी विकल्पों का हिस्सा कैसे बन सकते हैं। हमारा प्रयास है कि उपभोक्ता स्वाद और पोषण की गुणवत्ता पर ध्यान देते हुए जिम्मेदारी से इन उत्पादों का इस्तेमाल कर सकें।
चारू भाटिया: अंत में, खाद्य एवं वेलनेस उद्योग में अपना व्यवसाय शुरू करने की इच्छा रखने वाले युवा उद्यमियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
रैना कुमरा: मैं युवा उद्यमियों से कहूंगी कि वे इस क्षेत्र में डर या सीमित सोच के बजाय संभावनाओं से भरा दृष्टिकोण लेकर आएं। नवाचार के लिए यहां काफी अवसर हैं। उपभोक्ता लगातार ऐसे उत्पादों की तलाश में रहते हैं, जो उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान करें या उनके रोजमर्रा के अनुभव को बेहतर बनाएं।
उद्यमियों को सबसे पहले ऐसी जरूरत की पहचान करनी चाहिए, जिसका वास्तविक महत्व हो। इसके बाद उस पर अच्छी तरह शोध करना चाहिए और अपने समाधान को बाजार तक पहुंचाने के रचनात्मक तरीके विकसित करने चाहिए। प्रतिस्पर्धा हमेशा रहेगी, लेकिन इसके कारण किसी नए और अलग विचार पर काम करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।
हमारे लिए भी यह यात्रा लगातार आगे बढ़ रही है। हम भारत में स्पाइसवेल का विस्तार करने और दूसरे बाजारों में अपनी मौजूदगी मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसके साथ ही, हम भारत के केरल से प्रेरित एक नए उत्पाद को पेश करने की तैयारी भी कर रहे हैं।
अंततः, मेरा मानना है कि खाद्य एवं वेलनेस क्षेत्र में उन उद्यमियों के लिए बहुत संभावनाएं हैं, जो पारंपरिक ज्ञान, विचारशील नवाचार और उपभोक्ताओं की जरूरतों की अच्छी समझ को एक साथ लेकर चलते हैं। हमारा उद्देश्य ऐसे उत्पाद तैयार करना होना चाहिए, जो केवल व्यावसायिक रूप से सफल न हों, बल्कि लोगों के रोजमर्रा के जीवन में भी सार्थक भूमिका निभाएं।

