नई दिल्ली,
भारत के बैंक लगातार बढ़ रही कर्ज मांग, मजबूत डिजिटल सार्वजनिक ढांचा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कामकाजी मॉडल के तेज उपयोग से लाभ उठा रहे हैं। साथ ही जलवायु जोखिम, साइबर सुरक्षा और बेहतर प्रशासन पर बढ़ते नियामकीय ध्यान ने भी बैंकिंग क्षेत्र को अधिक मजबूत बनाने में भूमिका निभाई है। यह जानकारी एक नई रिपोर्ट में सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय सलाहकार संस्था केपीएमजी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय बैंक कई मामलों में वैश्विक बैंकों के बराबर खड़े दिखाई दे रहे हैं। बैंक अब केवल प्रयोग स्तर से आगे बढ़कर कृत्रिम बुद्धिमत्ता का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं। इसके साथ ही कर्मचारी कौशल को नए सिरे से विकसित करने, साइबर सुरक्षा मजबूत करने और पर्यावरण, सामाजिक तथा प्रशासनिक मानकों को बेहतर बनाने पर भी निवेश बढ़ाया जा रहा है, जिससे दीर्घकालीन मजबूती सुनिश्चित की जा सके।
रिपोर्ट के लिए दुनिया भर के बैंकिंग और पूंजी बाजार क्षेत्र के 110 मुख्य कार्यपालक अधिकारियों का सर्वेक्षण किया गया। इसमें पाया गया कि लगभग 83 प्रतिशत मुख्य कार्यपालक अधिकारी आने वाले तीन वर्षों में अपने कारोबार की वृद्धि को लेकर आश्वस्त हैं। वहीं 65 प्रतिशत अधिकारियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को सबसे महत्वपूर्ण निवेश प्राथमिकताओं में शामिल किया है। सर्वेक्षण के अनुसार करीब 70 प्रतिशत मुख्य कार्यपालक अधिकारियों ने कहा कि वे अगले 12 महीनों के बजट का लगभग 10 से 20 प्रतिशत हिस्सा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी परियोजनाओं पर खर्च करने की योजना बना रहे हैं। वहीं 59 प्रतिशत अधिकारियों का मानना है कि एजेंटिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता बैंकिंग व्यवस्था में बड़े स्तर पर परिवर्तन ला सकती है। इसके अलावा 69 प्रतिशत अधिकारियों को उम्मीद है कि इस निवेश का लाभ एक से तीन वर्षों के भीतर दिखाई देने लगेगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 83 प्रतिशत बैंकिंग और पूंजी बाजार क्षेत्र के मुख्य कार्यपालक अधिकारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए कर्मचारियों को नए कौशल सिखाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। वहीं 79 प्रतिशत का कहना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने शुरुआती स्तर की नौकरियों के लिए आवश्यक कौशल को पूरी तरह बदल दिया है। लगभग 78 प्रतिशत अधिकारियों ने चेतावनी दी कि यदि कर्मचारियों को समय पर तैयार नहीं किया गया तो इससे संस्थानों के कामकाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। केपीएमजी इंडिया में ट्रांजैक्शन सर्विसेज और वित्तीय सेवा सलाहकार विभाग के प्रमुख साझेदार संजय दोशी ने कहा कि वैश्विक बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ती संचालन लागत और सख्त नियमों के कारण बैंक अपने आकार और रणनीतिक विलय-अधिग्रहण के माध्यम से विस्तार की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। इसी तरह की प्रवृत्ति अब भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में भी तेजी से दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए आकार केवल बड़ा होना नहीं है, बल्कि यह वितरण नेटवर्क के विस्तार, डिजिटल बदलाव को तेज करने और लागत दक्षता बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।
दोशी के अनुसार जब बैंक प्रौद्योगिकी में निवेश बढ़ाते हुए अपने कामकाजी ढांचे को आधुनिक बना रहे हैं, तब चुनिंदा विलय, साझेदारी आधारित वृद्धि और नई रणनीतियां उन्हें नए बाजारों तक पहुंचने में मदद कर सकती हैं। इससे ग्राहकों के लिए बेहतर सेवाएं तैयार होंगी और लंबे समय तक प्रतिस्पर्धात्मक मजबूती भी मिलेगी। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लगभग 86 प्रतिशत मुख्य कार्यपालक अधिकारियों ने साइबर असुरक्षा को कारोबार की वृद्धि के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। इसके अलावा 56 प्रतिशत अधिकारियों ने नैतिक चुनौतियों को और 55 प्रतिशत ने डाटा की तैयारी तथा नियमों से जुड़े अंतर को प्रमुख जोखिम के रूप में चिन्हित किया।

