अंतरिक्ष में भारत की सफलता ना केवल देश की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता का प्रतीक हैं, बल्कि यह भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की शक्ति का भी प्रमाण है। इसरो के नेतृत्व में भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान और प्रक्षेपण क्षेत्र में वैश्विक मानकों को चुनौती दी है और अपनी प्रतिष्ठा बनाई है। आगामी गगनयान मिशन और भविष्य की अंतरिक्ष परियोजनाएं भारत को और भी अधिक ऊंचाइयों पर ले जाएंगी, जिससे वह अंतरिक्ष में अग्रणी भूमिका निभाएगा। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम वर्ष, १९६० के दशक में शुरू हुआ था, तब से देश ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। गत दिनों ही ४१ वर्ष बाद अंतरिक्ष स्टेशन के लिए भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने एक्सिओम स्पेस द्वारा संचालित वाणिज्यिक मिशन के तहत उड़ान भरी है। यह सभी भारतवासियों के लिए गौरव की बात के साथ-साथ एक ऐतिहासिक पल है। जो देश की अंतरिक्ष क्षमताओं को प्रदर्शित करता है। इससे पहले भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने वर्ष,१९८४ में सोयूज टी-११ मिशन के तहत अंतरिक्ष में सात दिन, इक्कीस घंटे और चालीस मिनट बिताए। उनका मिशन वैज्ञानिक अनुसंधान पर केंद्रित था, जिसमें माइक्रोग्रैविटी का अध्ययन और बायोलॉजी, फिजिक्स और पृथ्वी अवलोकन से जुड़े प्रयोग किए गए। इसके अलावा अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (नासा) से जुड़ी भारतीय मूल की कल्पना चावला ने अंतरिक्ष यान कोलंबिया से उड़ान भरी थी। नासा से ही जुड़ी भारतीय मूल की दूसरी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर नौ महीने बिताने के बाद इसी वर्ष तीन माह पहले पृथ्वी पर वापस लौटीं हैं। जहां भारत का अंतरिक्ष मिशन आर्यभट्ट से शुरू हुआ, यह भारत का पहला उपग्रह था, जिसे वर्ष,१९७५ में लॉन्च किया गया था। वहीं भारत का पहला चंद्र मिशन, जिसे २००८ में लॉन्च किया गया था और जिसने चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी के सबूत दिए थे। वर्ष, २०१३ में मंगलयान (मार्स ऑर्बिटर मिशन) लॉन्च किया गया,जिसने मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश किया था।

