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अब आवश्यकता है रीको और आरएफसी के एकीकरण की

by Business Remedies
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रीको एवं आरएफसी को बने हुए लगभग 35 से 40 साल से भी ज्यादा का समय हो चुका है। एक आर्थिक विश्लेषक के रूप में मेरा यह मानना है तथा सरकार को सुझाव भी है कि अब रीको एवं आरएफसी जैसी संस्थाओं की इतनी महत्वता फाइनेंस करने के लिए नहीं बची है, क्योंकि उनसे भी ज्यादा आसान तरीके से और आसान शर्तों पर भारत में बहुत सारे तरीके धन उपलब्ध कराने के लिए विकसित हो चुके हैं।
जहां तक इंडस्ट्रियल एरिया जो वर्तमान में कार्य कर रहे हैं, उनका सवाल है, वह सब पूरे हो चुके हैं, तो वहां उनके लोकल ऑफिसेज को रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह सरकार के लिए सफेद हाथी हैं। दोनों विभाग, मैं किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं लगाना चाहता, लेकिन जहां तक मेरी जानकारी में है, उन कार्यालयों में बैठे हुए अधिकतर कर्मचारी और अधिकारी सरकार के द्वारा नियत कार्य न करके, बल्कि प्रॉपर्टी डीलिंग में या अन्य कार्यों में लगे हुए हैं और जनता की कर द्वारा दी गई कमाई और सरकार द्वारा दिए जा रहे वेतन को भोग कर अपने कर्तव्यों का निर्वहन उचित तरीके से नहीं कर रहे हैं। बल्कि कई जगहों पर तो मैंने ऐसा भी देखा है कि वहां बैठे कर्मचारियों का बिना मतलब कोई ना कोई दखलंदाजी उस लोकल औद्योगिक क्षेत्र में रहती है और वह वहां के उद्योगपतियों के लिए परेशानी का कारण भी बने हुए हैं। तो बेहतर हो कि सरकार इन दोनों कंपनियों का मर्जर कर दे तो यह एक कंपनी बड़ी आर्थिक संपन्न कंपनी बनेगी। इसमें जितने भी क्षेत्रीय और जिला स्तरीय कार्यालय के भवन हैं, यदि वह उनके खुद के हैं तो उनका उचित निस्तारण किया जाए और पैसा इक_ा किया जाए और यदि वह किराए पर चल रहे हैं तो उनको खाली कर दिया जाए, जिससे सरकार की या इस विभाग की या कंपनी की मासिक किराए में दिया जा रहा खर्च की बंदिश लगे। इन दोनों ही स्थितियों में सरकार को फायदा है और उनके बदले में रीजनल ऑफिसेज जो बमुश्किल राजस्थान में 5 या 7 बड़े जिलों में खोल दिए जाएं, तो भी यह सारी समस्याओं का निराकरण वहां से बैठ करके भी किया जा सकेगा। बल्कि मेरा तो यह मानना है कि सिर्फ जयपुर में ही अगर एक हेड ऑफिस को ढंग से बना दिया जाए और ऑनलाइन तरीके से उद्योगपतियों की समस्याओं के लिए निस्तारण करें तो शायद वह ज्यादा अच्छे तरीके से हो सकेगा। और जितने भी इंडस्ट्रियल एरियाज में जमीन खाली पड़ी है और लोगों ने अलॉटमेंट ले लिया है, वह उनके अलॉटमेंट लेटर के नियम के विरुद्ध है तो उन्हें री एक्वायर करके उनके अलॉटमेंट को रिजेक्ट कर देना चाहिए। क्योंकि बहुत लोगों ने जमीन अलॉटमेंट कराकर 10-15 साल उसको रख विनियोजन करके रुपया कमाने का धंधा बना रखा है। उसको तुरंत लगाम लगाई जाए और दूसरा, जितनी भी खाली जमीन अभी तक किसी भी प्रकार से उपयोग में नहीं ली गई, उन्हें उपयोग में लिया जाए। जितने भी लोन आरएफसी के हो या रीको के हो, उन्हें किसी भी तरह से वसूलने के लिए एक लाभकारी स्कीम लाए और वन टाइम सेटलमेंट फोर्सली करें। रिकवरी के लिए बेहद सख्त कदम उठाए जाने की जरूरत है, चाहे वह सरफेसिया एक्ट लागू करना पड़े या कोई और कानून।
आज की तारीख में फाइनेंस के इस पूरे देश में बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं। यदि कोई डिफाल्टर अपना पेमेंट का भुगतान करना नहीं चाह रहा तो यह मान कर चलना चाहिए कि उसकी नीयत में खोट है। सरकार को उसे किसी भी तरह का ढीलापन नहीं बरतना चाहिए और रिकवरी को पूरे तरीके से रिकवर करें। जो भी पैसा उस नई संस्था के पास रिकवरी के बाद इक_ा हो, उससे वह पुराने औद्योगिक क्षेत्र अगर उन्हें उस क्षेत्र में चलाई जाने के लिए वायबल हो, उचित और उपयोगी हो, तो उनका और वह शहरी सीमाओं के अंदर नहीं हो या उन्हें वहां से शिफ्ट किया जाना संभव नहीं हो, तो उन औद्योगिक क्षेत्र का बहुत अच्छे तरीके से पुनर्नयन करें। यानी उनमें जितनी भी मूलभूत सुविधाओं की जरूरत है, उन्हें तुरंत पूरा करें, जिससे वहां के उद्योगपतियों को समस्याएं और परेशानियों से निजात मिले। सडक़ें, बिजली, पानी की जो समस्या है, उन्हें ठीक करना चाहिए। और जितना भी स्टाफ सरप्लस है, या तो उनको अनिवार्य सेवानिवृत्ति कर दिया जाए या उन्हें दूसरे और विभागों में समायोजित किया जाए।
मेरा माननीय मुख्यमंत्री महोदय एवं माननीय उद्योग मंत्री महोदय एवं सारे संबंधित अधिकारियों से निवेदन है कि इस पावन कार्य में अगर वह शिद्दत से लगेंगे तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि राजस्थान राज्य को पूरा देश एक रोल मॉडल के रूप में देखेगा।
सुनील दत्त गोयल, महानिदेशक, इम्पीरियल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री जयपुर, राजस्थान



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