चारू भाटिया | बिजनेस रेमेडीज/जयपुर। | राजस्थान में ऑर्थोपेडिक चिकित्साकेक्षेत्रमेंडॉ. आर.के. माथुर एक ऐसा नाम हैं जो सटीकता, समर्पण और मरीज–केंद्रित इलाज के लिए जाने जाते हैं। जयपुर में श्रेयादित्य हॉस्पिटल के संस्थापक के रूप में उन्होंने अपने वर्षों के अनुभव और अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण को एक ऐसे संस्थान में बदला है जो आधुनिक और किफायती ऑर्थोपेडिक उपचार उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। जॉइंट रिप्लेसमेंट, आर्थ्रोस्कोपी और स्पोर्ट्स इंजरी के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता है। उनका सफर केवल पेशेवर उपलब्धियों का नहीं, बल्कि हर व्यक्ति तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के दृढ़ संकल्प का भी प्रतीक है।
प्रश्न: आपने जयपुर में श्रेयादित्य हॉस्पिटल की स्थापना की है। अपने अब तक के सफर के बारे में बताइए। डॉक्टर बनने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
उत्तर: चिकित्सा क्षेत्र में मेरा सफर धैर्य, निरंतर सीखने और मरीजों की सेवा के संकल्प से जुड़ा रहा है। मैंने अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई कानपुर से पूरी की। इंटर्नशिप के दौरान धीरे–धीरे मेरी रुचि इस चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण क्षेत्र की ओर बढ़ी। इसके बाद मैंने जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर से पोस्टग्रेजुएशन किया। अपनी विशेषज्ञता को और बेहतर बनाने के लिए मैंने अहमदाबाद और हैदराबाद में फेलोशिप की, जहां जॉइंट रिप्लेसमेंट, आर्थोस्कोपी और स्पोर्ट्स इंजरी पर विशेष प्रशिक्षण लिया। अपने करियर में मुझे उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों के कई मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों में काम करने का अवसर मिला। हर संस्थान ने मुझे अलग–अलग तरह के मरीजों, संसाधनों की चुनौतियों और नई सर्जिकल तकनीकों को समझने का मौका दिया।
मुझे इंग्लैंड के रॉयल ब्लैकबर्न हॉस्पिटल में भी प्रशिक्षण और अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रेरणा की बात करें तो मेरे बड़े भाई, जो स्वयं डॉक्टर हैं, ने मेरे जीवन में अहम भूमिका निभाई। मरीजों के प्रति उनका समर्पण और इस पेशे को मिलने वाला सम्मान मुझे बहुत प्रभावित करता था। पीएमटी परीक्षा पास करके जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिलना मेरे जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने समाज की सेवा के लिए डॉक्टर बनने के मेरे संकल्प को मजबूत किया।
प्रश्न: इतने लंबे अनुभव के दौरान आपको कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा होगा। क्या आप कुछ अनुभव साझा करेंगे? साथ ही श्रेयादित्य हॉस्पिटल की स्थापना कैसे हुई?
उत्तर: जब मैंने 1997 में रेजीडेंसी प्रशिक्षण शुरू किया था, तब ऑर्थोपेडिक्स, खासकर जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी, भारत में बहुत ज्यादा प्रचलित नहीं थी। यह एक सीमित क्षेत्र माना जाता था। वर्ष 2005 के आसपास राजस्थान में जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी शुरू हुई, लेकिन उस समय यह बहुत महंगी थी और आज की तरह आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं थी। इस वजह से कई मरीजों के लिए यह इलाज कराना मुश्किल था। इसी अंतर को देखकर मेरे मन में एक विचार आया कि बेहतर ऑर्थोपेडिक इलाज केवल बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों तक सीमित नहीं होना चाहिए। कई निजी अस्पतालों में काम करने और उनकी कार्यप्रणाली को समझने के बाद मुझे लगा कि अब समय आ गया है कि एक ऐसा अस्पताल शुरू किया जाए जो किफायती होने के साथ–साथ उच्च गुणवत्ता वाला इलाज भी दे सके। इसी सोच से श्रेयादित्य हॉस्पिटल की स्थापना हुई। हमारा उद्देश्य उचित लागत पर आधुनिक ऑर्थोपेडिक इलाज उपलब्ध कराना है। हमारा अस्पताल एनएबीएच से मान्यता प्राप्त है, जो यह सुनिश्चित करता है कि हम मरीजों को उच्च स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करें।
प्रश्न: अस्पताल चलाते समय किफायती इलाज बनाए रखना मुश्किल होता है।आप इस संतुलन को कैसे बनाए रखते हैं?
उत्तर: स्वास्थ्य सेवाओं को टिकाऊ बनाने के लिए संतुलन जरूरी है। हम कोशिश करते हैं कि कॉर्पोरेट अस्पतालों की ऊंची फीस और सरकारी अस्पतालों की सीमित सुविधाओं के बीच एक संतुलित मॉडल अपनाया जाए। श्रेयादित्य हॉस्पिटल में हमारी सेवाएं कॉर्पोरेट अस्पतालों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत तक सस्ती हैं, लेकिन सुविधाओं, मानकों और मरीजों की देखभाल में हम किसी तरह का समझौता नहीं करते।
प्रश्न: श्रेयादित्य हॉस्पिटल में किस तरह की सेवाएं उपलब्ध हैं और आपकी मेडिकल टीम कितनी बड़ी है?
उत्तर: श्रेयादित्य ऑर्थोपेडिक हॉस्पिटल मुख्य रूप से जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी, आर्थ्रोस्कोपी और स्पोर्ट्स इंजरी के इलाज में विशेषज्ञता रखता है। हमारी जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी अनुभवी सर्जनों की टीम द्वारा की जाती है, जिनकी मदद सहायक सर्जन और फिजियोथेरेपिस्ट करते हैं। वर्तमान में हमारे पास तीन ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ, एक जनरल फिजिशियन और एक जनरल सर्जन हैं। अस्पताल की स्थापना के तीन वर्षों के भीतर ही हमने सटीक सर्जरी और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अपनी पहचान बनाई है।
प्रश्न: किसी नए अस्पताल के लिए शुरुआत में लोगों तक पहुंच बनाना कठिन होता है। आपने इसके लिए क्या रणनीति अपनाई?
उत्तर: मेरा मानना है कि भरोसा लगातार काम करने और लोगों के बीच मौजूद रहने से बनता है। शुरुआत से ही हमने सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया के माध्यम से लोगों से जुडऩे का प्रयास किया। हमने एक वेबसाइट भी बनाई ताकि मरीजों को हमारी सेवाओं की सही जानकारी मिल सके। आज के समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनके माध्यम से हम मरीजों से संवाद कर पाते हैं, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी साझा करते हैं और विश्वास का रिश्ता बनाते हैं।
प्रश्न: चिकित्सा क्षेत्र में एआई और रोबोटिक्स की भूमिका को आप कैसे देखते हैं, खासकर ऑर्थोपेडिक्स में?
उत्तर: अपने करियर में मैंने कई तकनीकी बदलाव देखे हैं। आम तौर पर किसी भी नई चिकित्सा तकनीक को व्यापक स्तर पर स्वीकार होने में 20 से 30 वर्ष का समय लगता है। भारत में एआई और रोबोटिक्स अभी शुरुआती चरण में हैं। इन्हें मुख्यधारा में आने में पांच से दस वर्ष का समय लग सकता है। इनका उपयोग कई बातों पर निर्भर करता है जैसे लागत, उपलब्धता, प्रशिक्षण और लोगों का भरोसा। अभी रोबोटिक सर्जरी कराने में प्रति ऑपरेशन लगभग एक लाख रुपये तक की अतिरिक्त लागत आ सकती है, जिससे यह सभी मरीजों के लिए संभव नहीं हो पाती। इसके अलावा केवल 10 से 15 प्रतिशत डॉक्टर ही एआई आधारित तकनीकों में प्रशिक्षित हैं। जैसे–जैसे प्रशिक्षण और तकनीक सस्ती होगी, वैसे–वैसे इसका उपयोग बढ़ेगा और अधिक मरीजों को इसका लाभ मिलेगा।
प्रश्न: ऑर्थोपेडिक और स्पाइन सर्जरी को लेकर कई तरह की गलत धारणाएं हैं। आप इन्हें कैसे स्पष्ट करेंगे?
उत्तर: सबसे आम गलत धारणा यह है कि स्पाइन सर्जरी हमेशा जोखिम भरी होती है या सफल नहीं होती। जबकि आज एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी आधुनिक जांच तकनीकों से सही निदान संभव है और इससे सर्जरी की सफलता दर काफी बढ़ जाती है। पहले जयपुर में बहुत कम एमआरआई सेंटर थे, लेकिन आज इनकी संख्या लगभग 50 हो चुकी है। इससे जांच और इलाज दोनों बेहतर हुए हैं। इसी तरह घुटने के प्रत्यारोपण की तकनीक भी समय के साथ काफी विकसित हुई है और अब इसके परिणाम पहले से कहीं बेहतर हैं। सर्जरी का निर्णय केवल उम्र के आधार पर नहीं होता। बीमारी की स्थिति और उसकी गंभीरता को देखकर ही डॉक्टर इलाज तय करते हैं। यदि बीमारी ज्यादा बढ़ चुकी हो तो सर्जरी जरूरी हो जाती है ताकि मरीज फिर से सामान्य जीवन जी सके।
प्रश्न: आयुष्मान भारत और आरजीएचएस जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के बारे में आपकी क्या राय है?
उत्तर: मरीजों के लिए ये योजनाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इससे महंगा इलाज भी किफायती हो जाता है। सरकार का उद्देश्य सराहनीय है। हालांकि अस्पतालों के लिए समय पर भुगतान मिलना भी जरूरी है। यदि भुगतान में देरी होती है तो इससे अस्पतालों के संचालन पर असर पड़ता है। यदि प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए तो अस्पताल और मरीज दोनों को फायदा होगा।
प्रश्न: आज कल जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इसका ऑर्थोपेडिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?
उत्तर: मैं अक्सर कहता हूं कि जीवन का मतलब है चलना–फिरना और चलना–फिरना ही जीवन है। आज की बैठकर काम करने वाली जीवनशैली शरीर के लिए हानिकारक है। शारीरिक गतिविधि की कमी, लंबे समय तक मोबाइल और कंप्यूटर का इस्तेमाल, गलत बैठने की आदत, तनाव और गलत खान–पान शरीर पर बुरा असर डालते हैं। शरीर एक दूसरे से जुड़े सिस्टम की तरह काम करता है। जोड़ों का दर्द या आर्थराइटिस होने पर व्यक्ति की गतिविधि कम हो जाती है, जिससे हृदय और फेफड़ों की कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है। वहीं डायबिटीज, मोटापा और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं भी जोड़ों की बीमारी को बढ़ा सकती हैं। इसलिए नियमित व्यायाम बहुत जरूरी है। रोज कम से कम एक घंटे शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। 40 वर्ष से कम उम्र के लोग दौड़ या खेलकूद कर सकते हैं, जबकि 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को तैराकी, तेज चलना या हल्के खेलों को अपनाना चाहिए।
प्रश्न: ऑर्थोपेडिक्स में अलग–अलग विशेषज्ञता बढ़ रही है। आप इस बदलाव को कैसे देखते हैं?
उत्तर: विशेषज्ञता से इलाज और अधिक सटीक होता है। ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में मरीज पहले जनरल डॉक्टर से मिलते हैं और फिर जरूरत पडऩे पर विशेषज्ञ के पास भेजे जाते हैं। भारत भी धीरे–धीरे इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आज ऑर्थोपेडिक्स में स्पाइन सर्जरी, स्पोर्ट्स इंजरी, नी रिप्लेसमेंट और फुट एंड एंकल सर्जरी जैसे अलग–अलग क्षेत्र विकसित हो चुके हैं। इससे डॉक्टरों की विशेषज्ञता बढ़ती है और मरीजों को बेहतर इलाज मिलता है। हालांकि भारत में अभी भी बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाओं की जरूरत है।
प्रश्न: आज के समय में राजस्थान की स्वास्थ्य सेवाओं को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर: पिछले दस वर्षों में राजस्थान में स्वास्थ्य सेवाओं में काफी सुधार हुआ है। पहले लोग बेहतर इलाज के लिए राज्य के बाहर जाते थे, लेकिन अब यहां सुविधाएं काफी बढ़ी हैं। बेहतर हवाई संपर्क, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के साथ तकनीकी सहयोग और चिकित्सा ढांचे में सुधार से राजस्थान का स्वास्थ्य क्षेत्र मजबूत हुआ है। अब यहां ज्ञान और तकनीक का आदान–प्रदान भी हो रहा है।
प्रश्न: युवा मेडिकल छात्रों के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर: चिकित्सा एक ऐसा पेशा है जो केवल आर्थिक रूप से ही नहीं बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से भी संतोष देता है। लेकिन इस क्षेत्र में आने वालों के लिए जरूरी है कि उनका उद्देश्य केवल पैसा कमाना न हो, बल्कि मरीजों की सेवा करना हो। जब मरीजों की भलाई को प्राथमिकता दी जाती है, तो सफलता और संतोष अपने आप मिलते हैं।

