स्थानीय प्रोसेसिंग की कमी से 80 प्रतिशत निर्यात मजबूरी
भरतपुर, अलवर, धौलपुर और श्रीगंगानगर उत्पादन में आगे
बिजनेस रेमेडीज/जयपुर। राजस्थान देश का सबसे बड़ा उत्पादन राज्य है। वर्ष 2024-25 में देश के कुछ सरसों उत्पादन का 45 से 49 प्रतिशत (करीब 52.03 लाख टन) सरसों अकेला राजस्थान देता है। भारती कृषि अनुसंधान परिषद और रेपसीड सरसों अनुसंधान निदेशालय 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में 34.74 लाख हेक्टेयर भूमि पर सरसों की खेती होती है, इसमें से भरतपुर, धौलपुर, अलवर, सवाई माधोपुर और श्रीगंगानगर शीर्ष जिलों में शामिल हैं। इनमें से भरतपुर में (11.23 लाख टन), अलवर में (10 लाख टन) और श्रीगंगानगर (7 लाख टन) अग्रणी जिले हैं। वर्तमान में सरकारी बेरुखी और बुनियादी ढांचे की कमी से 62 प्रतिशत सरसों तेल मिलें बंद हो चुकी हैं। मजबूरी में कच्चा सरसों गुजरात (उंझा मंडी) और दिल्ली (खारी बावली) भेजा जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का मानें तो राज्य में अगर स्थानीय प्रोसेसिंग 50 फीसदी तक बढ़े तो 5,000 करोड़ की अतिरिक्त आया और 25,000 को रोजगार मिल सकता है।
प्रदेश में 1600 में से 600 मिलें ही चल रहीं
राजस्थान में कभी 1,600 से ज्यादा तेल मिलें थीं, जिनमें से करीब 1,000 बंद हो चुकी हैं। जो 600 चल रही हैं, वे भी पूरी क्षमता से नहीं चल पा रही हैं। ये 600 मिलें अपनी क्षमता का केवल 50 प्रतिशत ही उत्पादन कर रही हैं। वीकेआई (जयपुर), सेवर (भरतपुर) और बासनी (जोधपुर) में 300 से ज्यादा तेल मिलें हैं। साथ पशु आहार कारखाने भी 150 से ज्यादा हैं, जो मुख्यत: जयपुर, अलवर और बीकानेर में हैं। ये कारखाने सरसों की खली (30 प्रतिशत उत्पादन) से पशु आहार बनाते हैं, जिसकी मांग गुजरात और महाराष्ट्र में है।
देश-विदेश में निर्यात
राजस्थान में 20 प्रतिशत सरसों (10.4 लाख टन) स्थानीय खपत में जाता है, जिसमें जयपुर, जोधपुर और उदयपुर के बाजार शामिल हैं। 80 प्रतिशत (41.6 लाख टन) निर्यात होता है, जिसमें गुजरात (40 प्रतिशत), दिल्ली (20 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (15 प्रतिशत) और विदेश (25 प्रतिशत) शामिल हैं। विदेशी गंतव्य आस्ट्रेलिया (1.34 लाख टन), यूएई, यूएसए और नीदरलैंड हैं। वर्ष 2024 में सरसों तेल निर्यात से 15,370 करोड़ रुपए (48.85 लाख टन) की आय हुई।
कंपनियां और खरीद
बड़ी कंपनियां जैसे अडानी विलमर, बुंगे इंडिया और इमामी एग्रोटेक राजस्थान से 20 लाख टन सरसों खरीदती हैं। अडानी विलमर (8 लाख टन), बुंगे इंडिया (6 लाख टन) और इमामी एग्रोटेक (4 लाख टन) प्रमुख हैं। खली को मदर डेयरी और अमूल जैसे डेयरी ब्रांड 50,000 टन खरीदते हैं।
तेल मिलों के बंद होने के कारण
प्रदेश में 0.5 प्रतिशत किसान कल्याण शुल्क व 1 प्रतिशत मंडी कर शामिल हैं। इस कर को समाप्त करने की सरकार से मंडी व्यापारी कर बार गुहार लगा चुके हैं। इसके अलावा किसान सरकार की ओर से लागू एमएसपी से कम दर पर सरसों बेचने को मजबूर हैं, इससे किसानों को घाटा हो रहा है। इसी कारण पैदावर का 70 प्रतिशत माल गुजरात जा रहा है। इसके अलावा जीएसटी का बोझ भी किसानों पर है। 18 प्रतिशत जीएसटी व इनवर्टेड ड्यूटी से किसानों हतोत्साहित हैं। इससे किसानों की लागत बढ़ रही है। वहीं सरसों के तेल के मुकाबले आयातित सोया व पाम ऑयल (६5) प्रतिशत सस्ते हैं। साथ ही राजस्थान में महंगी बिजली भी लागत बढ़ा रही है।
सरकारी प्रयास और रोजगार
राइजिंग राजस्थान 2024 में 500 करोड़ रुपए की सब्सिडी और 5 तेल पार्क (जयपुर, भरतपुर, अलवर) प्रस्तावित हैं। पीएमएफएमई स्कीम ने 100 माइक्रो यूनिट्स को 50 प्रतिशत सब्सिडी दी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और रेपसीड सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर ने कच्ची घानी यूनिट्स के लिए प्रशिक्षण शुरू किया। सरसों उद्योग से 50,000 प्रत्यक्ष (मिलें) और 1 लाख अप्रत्यक्ष (कृषि, परिवहन) रोजगार हैं, जिनमें जयपुर (20,000) और अलवर (15,000) अग्रणी हैं।
– राजस्थान में कृषि कल्याण सेस व मंडी टैक्स की वजह से सरसों की तेल मिलें बंद हो रही हैं। राजस्थान में बड़ी मात्रा में सरसों उत्पादन होता है, लेकिन बाजार में केवल 20-22 लाख टन ही सरसों आ पाती है। बाकी सरसों दूसरे राज्यों में चली जाती हैं। उन राज्यों में किसी प्रकार का टैक्स नहीं है। अगर सरसों तेल का प्रोडक्शन राजस्था
न में होता है तो यहां की मिलें भी चलती और रोजगार भी पैदा होता। इसलिए कृषि कल्याण सेस को तत्काल समाप्त होना चाहिए। क्योंकि यह टैक्स राजस्थान के अलावा किसी अन्य राज्य में नहीं है। दूसरा भारत सरकार खेती के मापदंड को सही करे। बाजार जब नीचे जाता है तो सरकार सरसों को खरीद लेती है। किसानों को उनका वाजिब हक मिलना चाहिए। तीसरा कारण है नेपाल साफ्टा का बड़ा लाभ उठा रहा है। नेपाल में खुद का सरसों उत्पादन नहीं है। वह विदेशी तेलों को इंपोर्ट करके ही भारत में बेचता है। क्योंकि नेपाल से आने वाले किसी भी सामान पर इंपोर्ट ड्यूटी नहीं लगती है। इसलिए यह तेल हरियाणा और राजस्थान तक भी पहुंच रहा है। सरकार को इस तरह के एग्रीमेंट्स पर भी फिर से विचार करना चाहिए, जिससे राजस्थान में सरसों तेल के उद्योग को बचाया जा सके।
– मनोज मुरारका, अध्यक्ष, नेशनल ऑयल एंड ट्रेड एसोसिएशन
– सरसों का तेल अन्य तेलों के मुकाबले बहुत महंगा पड़ रहा है। दूसरा इस वर्ष पिछले वर्ष के मुकाबले 11 लाख टन सरसों कम पैदा हुई है। इसके अलावा सरकार को विदेशों से जो तेल खरीद रही है, वह बहुत सस्ता है। इस कारण सरसों की तेल मिलें बड़ी संख्या में बंद हो रही हैं। पहले फुटकर में सरसों के तेल का बहुत उपयोग होता था, लेकिन अब सब जगह पॉम ऑयल ही उपयोग में लिया जा रहा है। ब्रांड नेम से जो सरसों का तेल बिक रहा है, वह बहुत महंगा बिक रहा है। इस कारण मुनाफे की बजाय घाटा हो रहा है। इस कारण ही तेल मिलें बंद हो रही हैं।
– गुरदीप सिंह, प्रोपराइटर, सरदार जी ऑयल मिल, भरतपुर
– बीते दो सालों में कुछ तो सरसों की चाल अच्छी नहीं थी। सरसों कुछ समय के लिए लोगों का मुंह मीठा करके जाती है। बीते एक-दो सालों में ऐसा नहीं हुआ। दूसरे सरसों तेल के व्यापार में कोविड के बाद बहुत से नए लोग आए। लोगों का मानना था कि भरतपुर के रीजन के हिसाब से अच्छा काम है। कोविड के समय खाने-पीने के व्यापारियों ने अच्छा काम किया था, लेकिन हर व्यापार में कुछ अच्छाई होती है तो कुछ बुराई भी होती है। इसी कारण जो नए लोग व्यापार में कूदे, उनके लिए यह समय अच्छा नहीं रहा। सरसों के तेल के व्यापार में कोई कमी नहीं है। अच्छे सोच के साथ आएं और धैर्य रखें तो सफल हो सकते हैं। वर्तमान में पॉम ऑयल और सरसों के तेल की कीमतों में काफी डिफरेंस हैं। इस कारण लोग उनकी तरफ मुड़ रहे हैं। सरसों ही नहीं, पॉम ऑयल की चोट सभी प्रकार के तेलों पर है। चाहे वह पॉम ऑयल हो, सोयाबीन तेल हो या राइस ब्रान तेल हो। ये सभी तेल करीब 40 रुपए के डिफरेंस में बिक रहे हैं।
– मनु अग्रवाल, डायरेक्टर, हरि इंडस्ट्री, भरतपुर




