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अहंकार का करें त्याग

by admin@bremedies
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जो लोग अपने अहंकार का त्याग करते है,वही आगे चलकर महान व्यक्ति बन पाते है। मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन उसका अहंकार है। आश्चर्य की बात है कि यह जानते हुए भी वह अहंकार को नही छोड पाता। किसी को अपनी सुन्दर देह का अहंकार है, किसी को धन का, किसी को ज्ञान का, किसी को पद का, तो किसी को ऊची जाति का। किसी-किसी को स्वाभिमान और आत्म-सम्मान के नाम पर भी अहंकार हो जाता है। मनुष्य इन तरह-तरह के अहंकारो से स्वयं चिपका रहता है, लेकिन आरोप लगाता है कि अहंकार ने उसे जकड़ा हुआ है। वह कभी अपने भीतर झाककर देखने की कोशिश नही करता कि उसने ही अहंकार से मोह रखा हुआ है। मनुष्य का यह भ्रम पालना ही अहंकार है कि यह मेरा है। यह घर या कार्यालय मेरा है और यह मेरी बदौलत चल रहा है। मनुष्य इसी मे और मेरा के विकार से ग्रस्त रहता है। जब तक मनुष्य मे मै और मेरा की अकड रहती है, तब तक वह दुखी रहता है। ज्यो ही वह इन विकारो को पहचानता और इनका त्याग करता है, वह भवसागर तर जाता है। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि जिस त्याग से अभिमान उत्पन्न होता है, वह त्याग नही। त्याग से शांति मिलनी चाहिए। अंतत अभिमान का त्याग ही सच्चा त्याग है। मनुष्य अहंकार न करे, तो वह कभी गलत रास्ते पर नही जा सकता, लेकिन उसमे अहंकार आते ही उसका पतन शुरू हो जाता है। यानी उसी का अहंकार उसे खा जाता है।

रावण के पास किसी भी चीज की कमी नही थी और वह बहुत बड़ा पंडित भी था, लेकिन अहंकार ने उसका विनाश कर दिया। इसी तरह दुर्योधन भी अहंकारी था। अगर उसने अपना अहंकार छोड ̧कर सब्र से काम लिया होता तो महाभारत का युद्ध नही होता। जो लोग अपने अहंकार का त्याग करते है, वही आगे चलकर महान व्यक्ति बन पाते है। समझदार लोग कभी झूठी अकड या शान दिखाकर अपना काम नही बिगाडते है। महात्मा गाँधी, लाल बहादुर शास्त्री, स्वामी विवेकानन्द जैसे कई महापुरुषो के उदाहरण है, जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि सादगी और आदर्श का जीवन ही व्यक्ति को महान बनाता है। इस संबंद मे महात्मा गाँधी के विचार है, जो हम करते है, वह दूसरे भी कर सकते है, ऐसा माने।

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